लोकतंत्र का सबसे मजबूत और चैथा स्तम्भ का गौरव हासिल करने वाली पत्रकारिता आज इक्कीसवीं सदी के मुहाने पर खड़ी कराह रही है। शायद ही कोई इस बात को मानने के लिए राजी होगा,लेकिन ये एक कटु सत्य है कि उपभोक्तावादी और बाजारवाद की दुनिया में पत्रकारिता चाटुकारों की मण्डी में खड़ी होकर अपनी नीलामी करा रही है। पत्रकारिता का राजनीतिककरण किया जा चुका है, जिसमें शब्दों का मर्म नजर नहीं आता वल्कि चाटुकारिता और द्वेष की मिलीजुली दुर्गंध आती है। मुझे ये बात कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि आज जिस तरह से पत्रकारिता का चीर हरण हो रहा है उससे पत्रकारिता की साख दांव पर लगी हुई है।

पत्रकारिता जनसंदेश को प्रसारित करने का एक बेहतर माध्यम है ये सरकार और जनता के बीच एक मजबूत सेतु की तरह है जिसमें बेहतर तालमेल होना बहुत जरूरी है जो सीधे-सीधे सरकार को जनता के द्वार तक पहुचाने मे अपनी भूमिका निभाता है। लेकिन आज की पत्रकारिता अपने रास्ते से भटक गई है,पत्रकारिता अब ऐसे हालातों से होकर गुजर रही है जहां से लोगों का यकीन पत्रकारिता पर से ही उठता जा रहा है। यकीन उठने की सबसे बड़ी वजह पत्रकारिता का पूर्णत्या व्यवसायीकरण होने के साथ-साथ सोशल मीडिया फेसबुक,व्हाटसअप,टवीटर पर स्तरहीन पत्रकारिता के साथ इलैक्ट्रोनिक मीडिया ने प्रिन्ट मीडिया को कमजोर बनाने का काम किया है। आज के मशीनी युग में किसी को वक्त नहीं है कि वो सुबह तक अखबार का इंतजार करे । फिर पाठक भी ग्लैमर पसन्द हो गया है उसे भी भड़काऊ और मसालेदार खबर चाहिए क्योंकि जमाना वायरल होने का है जिसका पाठक भी अभयस्त हो चला है।

दुर्भाग्य है कि ज्यादातर मीडिया हाऊस राजनीतिक घरानों की चरण वन्दना करते नजर आते हैं या यूं कह ले उनसे जुड़े हैं। टी.वी.चैनल्स में टी.आर.पी. बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान है ऐसे में देश के ज्वलन्त मुद्दे गौण हो जाते हैं क्योंकि विज्ञापन लेने हैं एसे में राजनीति और पूजीवाद के दौर में मीडिया गुलामी की जंजीरों में कैद होता जा रहा है। पत्रकारिता का हश्र ये है कि पत्रकार और पत्रकारिता दोनों ही अविश्वास का दंश झेल रहे हैं। इसका खौफ इस कदर गालिब है कि हर कोई सच दिखाने ओर लिखने से कतराने लगा है इसे टोटल राजनीतिकरण नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे आज मीडिया सरकार से घबराने लगा है।

जो निष्पक्ष लिख रहे हैं या दिखाने की कोशिश करते हैं उनकी जान पर खतरा मंडराता रहता है। पत्रकार अपनी ईमानदारी से किये गये लेखन का पुरसकार कम उण्ड का भागीदार ज्यादा होता है उसे अपनी ईमानदारी से समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। बहरहाल कहने का मतलब साफ है कि आजकी पत्रकारिता जिस रास्ते पर दौड़ पड़ी है उसकी चमकीली सड़कों पर महत्वाकांक्षाओं के चैराहे हैं जिसके बाीच दौड़ने से चन्द सिकके तो मिलेंगे लेकिन निष्पक्षता गिरवी रख जायेगी ईमानदारी लकवाग्रस्त हो जायेगी और आस्तित्व सिसकते-सिसकते दम तोड़ देगा।

सलीम रज़ा।
स्वतंत्र पत्रकार।
देहरादून,उत्तराखण्ड

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