कहावत हैं कि ‘कभी नाव पानी पर,कभी पानी नाव पर’ कैसी त्रासदी झेलनी पड़ती होगी जब तेजी की तरफ पानी पर चलती हुई नाव अपने गंतव्य को जाती ह,ै और उसका खिवैया समय के थपेड़ों से अन्जान लापरवाह सा चलता चला जाता है लेकिन पानी में उठ रहे तूफान से बेखबर जब तक संभले पानी नाव में भर जाता है और फिर नतीजा वहीं नाव भंवर में हिचकोले लेते हुये डूबने के कगार पर। ऐसा ही कुछ इन दिनों हाल 7 दशक पुरानी कांग्रेस पार्टी का ह,ै जिसकी नैया बीच भंवर में हिचकोले खा रही है ये उसी लापरवाही अनदेखी और समय से बेखबर रहने का नतीजा है। जिस कांग्रेस ने देश की आजादी में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था जिसके नेताओं ने देश की आजादी के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी थी जिसके संघर्ष का ही नतीजा था कि देश को आजादी मिली और देश को एक नई राह मिली, लेकिन समय बड़ा बलवान होता है आज वही कांग्रेस अपने आस्तित्व बचाने की जंग लड़ रही है।

आज पार्टी के मुखिया को अपनी देशभक्ति साबित करनी पड़ रही है, ये उसी नाविक की तरह लापरवाही का नतीजा है जो देश को अपनी बपौती मान कर चल रहे थे। ये सही है कि भारत ऐसे देश में अभिव्यक्ति की आजादी है, लेकिन कम से कम देश की अस्मिता पर जब आंच आये तो शायद कोई भी समझौता नहीं होना चाहिए। कांग्रेस ने कुछ ऐसी भूलें करी हैं जिसके चलते उनके सम्मुख ऐसी परिस्थितियां आ गई कि उन्हें अपनी पार्टी को जिन्दा रखने के लिए आक्सीजन की जरूरत है और ये आक्सीजन दूषित हो चुकी कांग्रेस पार्टी में तो मिलना मुश्किल है लिहाजा कांग्रेस पार्टी को जीवित रखने के किसी दूसरे रास्ते को अपनाना जरूरी है। पार्टी के अन्दर इस कदर निगेटिविटी बढ़ गई है जिसने पार्टी की सोच को छोटा बना दिया है। अभी संसद में किस तरह से प्रधानमंत्री ने अपने वक्तव्य में कांग्रेस पर प्रहार किये थे लेकिन कांग्रेस खामोश बैठी सदन में अपनी उपसिथति दर्ज कराती रही।

आज कांग्रेस के इस हश्र के लिए इसके नेता ही ज्यादा जिम्मेदार हैं खासतौर से खुद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी । राहुल गांधी जे.एन.यू. काण्ड में विद्रोही छात्रों के साथ खड़े होकर उनकी हिमायत कर रहे थे जो देश विरोधी नारे लगा रहे थे इसे राहुल गांधी की राजनीतिक अपरिपक्वता ही कहा जायेगा। हालांकि राहुल गांधी को इसका विरोध करना चाहिए था और अपनी इस गल्ती के लिए देश की जनता से खेद जताना चाहिए था। कैसी बिडम्बना है कि जिस कांग्रेस ने शान के साथ देश पर शासन किया है आज कांग्रेस की गल्तियों का ही नतीजा है कि वो 44 सीटों पर ही सिमट कर रह गई। इस बात से मंुह नहीं मोड़ा जा सकता कि हिन्दुस्तान में लम्बे अर्से तक अकेले राज करने वाली कांग्रेस अपने पतन की तरफ चल चुकी है। कांग्रेस को अब बेहद जरूरी है कि वो मंथन करके किसी भी भविष्य की योजनाओं को अमली जामा पहनाये, उससे पहले कांग्रेस को अपनी असफलताओं के कारकों को देखना होगा।

आजादी के बाद की कंाग्रेस की कामयाबी का रास्ता महात्मा गांधी से होकर गुजरता है , महात्मा गांधी अ्रगे्रजों के खिलाफ लड़ाई के नायक थे उनका प्रभाव देश के हर व्यक्ति के दिलो दिमाग पर था आहिस्ता-आहिस्ता कांग्रेस और गांधी जी एक दूसरे के पूरक बन गये थे। वहीं गांधी जी के पास कांग्रेस का कोई भी पद न होने के बाद भी कांग्रेस पार्टी में गांधी जी की ही बात मानी जाती थी, इसका उदाहरण था कि त्रिपुरा अधिवेशन में उनकी मर्जी के खिलाफ अध्यक्ष मनोनीत किये गये सुभाष बाबू को इस्तीफा देना पड़ा था। कांग्रेस का इतिहास बताता है कि राज्य समितियों की पहली पसन्द सरदार बल्लभ भाई पटेल को पीछे करने के लिए गांधी जी ने ही वीटो लगाकर नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने का रास्ता साफ कर दिया था और जवाहर लाल नेहरू आजाद हिन्दुस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने थे यह कहना गलत नहीं होगा कि गांधी जी का्रग्रेस में कुछ भी न रहते हुये सब कुछ थे।

गांधी जी ने कभी न तो शासन में हिस्सा लिया और न ही पार्टी में यहां तक की अपने परिवार को भी इससे दूर रखा। आजादी से पहले कांग्रेस में अलग-अलग विचार धाराओं वाले लोग थे इसीलिए गांधी जी ने काग्रेस को भंग करने की बात कहकर अपना त्यागपत्र दे दिया था। नेहरू जिनके अन्दर सत्ता की लालसा तो थी ही और अपनी एक मात्र पुत्री को राजनीति में स्थापित करने की दूरगामी सोच लिहाजा नेहरू जी ने गांधी जी की बात नहीं मानी। गांधी जी की मृत्यु के बाद शासन और पार्टी में नाराजगी खुलकर सामने आ गई जिसका परिणाम ये निकला कि जय प्रकाश नारायण,सी राजगोपालाचारी, मोरारजी देसाई, आचार्य कृपलानी, डाक्टर लोहिया और आचार्य नरेन्द्र देव सरीखे लोग पार्टी से अलग हो गये। लेकिन वे अपनी पहचान कांग्रेस से अलग नहीं बना पाये। इंदिरा गांधी की मुत्यु के बाद अपना प्रभाव खो रही कांग्रेस को राजीव गांधी को मिली सहानुभूति जीत ने एक बार फिर रास्ते पर ला दिया था , उसके बाद वी.पी.सिंह और चन्द्रशेखर सत्ता पर काबिज हुये थे लेकिन वे कांग्रेसी ही थे। लिहाजा अब दो जमात हो गई एक तरफ असली कांग्रेसी और दूसरी तरफ कांग्रेस से निकले लोग लिहाजा जनता ने भी असली कांग्रेसियों का ही साथ देना उचित समझा।

आज इस कांग्रेस पार्टी का हश्र ये है कि धीरे-धीरे परिवार वाद की जद में फंसी कांग्रेस अब अपने आप को जिंदा रख पाने की लड़ाई लड़ रही है, मेरे समझ से उसे भारतीय जनता पार्टी का अनुसरण करना चाहिए । ये सत्य है कि कांग्रेस की सफलता में जहां नेतृत्व विहीन विपक्ष था तो उसका कारण था कि कांग्रेस के पास नेहरू जैसी प्रतिभा के धनी व्यक्ति का नेतृत्व था तो गांधी जी जैसी नैतिक ताकत थी और अब भारतीय जनता पार्टी में मोदी सरीखा नेतृत्व और नैतिक ताकत के रूप में संघ है। अन्तर इतना है कि कांग्रेस को अप्रत्याशित मिली पराजय के बाद भी परिवार वाद के मोह में नेतृत्व बदलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी जिसनें प्रचण्ड जीत मिलने के वावजूद अपना नया अध्यक्ष चुननेे का साहस दिखाया है ।

बहरहाल कांग्रेस को यदि राजनीति में भारतीय जनता पार्टी जैसी पार्टी से सत्ता वापस लेनी है तो कांग्रेस नाम से ही किनारा करना होगा। जैसे आजादी के बाद गांधी जी ने कहा था, की आजादी मिल गई है अब कांग्रेस को खत्म कर देना चाहिए लेकिन नेहरू की पद लालसा ने उसे नकार दिया था। अब सही वक्त आ गया है कि राहुल गांधी और तमाम नेताओं को गांधी जी की बात का अनुसरण करते हुए कांग्रेस को खत्म कर एक नई पार्टी बनानी चाहिए तो हो सकता है कि आने वाले समय में मजबूती के साथ भाजपा का सामना कर पायें, अन्यथा मोदी जी का कांग्रेस मुक्ति भारत का सपना साकार होने में ज्यादा दिन नहीं बचे है।

सलीम रज़ा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *