भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित जीत से समूचा विपक्ष मानो कोमा मे चला गया हो। अब विपक्ष किस बात का मंथन करेगा अपनी पराजय का या फिर अपनी दुर्गति का जो उसे मोदी सुनामी से हासिल हुई है। दरअसल ये मंथन नहीं वल्कि आत्ममंथन का वक्त है ये मंथन है अनस्किल्ड लीडरशिप का ये मंथन होना चाहिए जातिवाद बनाम राष्ट्रवाद पर ये मंथन होना चाहिए वंशवाद का जिसे विपक्ष ने हथियार बनाकर इस चुनाव में इस्तेमाल किया था जिसे देश की जनता ने सिरे से नकार कर राष्ट्रवाद को तरजीह दी सही मायनों में ये चुनाव विपक्ष की गलत नीतियों के खिलाफ लड़ा गया था। 1971 के बाद 2019 में ऐसा हुआ है जब प्रचंड बहुमत के साथ कोई पार्टी दुबारा अपनी सरकार बनाने जा रही है। जिस तरह से अपनी पार्टी की जीत से गदगद नरेन्द्र मोदी ने सेन्ट्रल हाल में अपने उदबोधन में देश को नई दिशा में ले जाने का जो संकल्प जाहिर किया है वो सच में उनकी दूरदर्शी सोच है। देश के अन्दर असमानता को बैलेन्स करने के लिए भाजपा नीति नारा सबका साथ सबका विकास के साथ अब सबका विश्वास जोड़कर अपने इरादे स्पष्ट कर दिये। खास तौर से उन्होंने अल्पसंख्यकों पर फोकस करते हुये कहा कि देश के अन्दर हर पार्टी ने अल्पसंख्यकों का फायदा उठाया लेकिन उनके उत्थान के लिए कोई प्रभावी मसौदा नहीं तैयार किया जो था भी वह महज चुनावी चासनी में लपेटा हुआ लालीपाप था जो रैपर से बाहर निकला ही नहीं। किसी भी पार्टी को आशातीत सफलता तब मिलती है जब पार्टी और संगठन में बेहतर ताजमेल होगा,यानि नेता जो सोचे उसे संगठन पूरा करने के लिए वचनवद्ध हो और जो संगठन की सोच है उस पर नेता खरा उतरे।

शायद ऐसा बेहतर तालमेल अब तक किसी पार्टी में नहीं दिखा जो भारतीय जनता पार्टी में देखने को मिला। भारतीय जनता पार्टी में यदि कोई सुपर हिट जोड़ी है तो वो है नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की और अगर कोई बेहतर रणनीतिकार है तो वो है अमित शाह अगर उन्हें आधुनिक चाणक्य कहा जाये तो शायद गलत नहीं होगा। देश में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी कह लें या उनकी केमिस्ट्री कह लें वो करके दिखा दिया जिसे नामुमकिन को मुमकिन कर देना कहा जा सकता है। ये जो आज प्रचन्ड बहुमत भारतीय जनता पार्टी को मिला है उसका सेहरा सही में नरेद्र मोदी और अमित शाह के सिर बांधा जाना चाहिए ये बहुमत यूं ही नहीं मिला इसे पाने में संकल्प,आपसी तालमेल और विश्वास का बेहतर संगम था। संगठन को अपने नेता और नेता को अपने संगठन पर यकीन होना चाहिए, जबकि मौजूदा महागठबन्धन के हालात ऐसे थे जिसके अन्दर न तो नेता को संगठन पर यकीन था और न संगठन को नेता पर सबसे बड़ी वजह थी कि महागठबन्धन औंधे मुंह गिरा। इस पर विपक्षी यदि मंथन करेंगे तो अपने आप को बेहद कमजोर और मजबूर पायेंगे। भारतीय जनता पार्टी का मूल मंत्र सबका साथ सबका विकास सबका विश्वास ये जुमला नहीं कहा जा सकता वल्कि देश ने जो मेन्डेट दिया है वो इस बात का संदेश है कि पार्टी से बड़ा देश है। जबकि और पार्टियों की प्रथमिकता पार्टी पहले देश बाद में क्योकि इसके पीछे उनकी मंशा अपने परिवार को सियासत के जरिये सही मुकाम दिलाने के साथ-साथ आर्थिक रूप से मजबूत करने की होती है इसी वंशवाद और परिवार वाद की राजनीति को देश की जनता ने इस चुनाव में उखाड़ फेंका है।

इस चुनाव में नरेन्द्र मोदी को खरा सोना बनाने में महागठबन्धन राजनीति का भी बहुत बड़ा योगदान है ये तो सर्वविदित है कि सियासत में एक दूसरी पार्टियों में मतभेद थे और हमेशा रहेंगे लेकिन उसकी मर्यादायें और उसके मानदण्डों को कभी नहीं भूलना चाहिये इसकी वानगी पुलवामा और वालाकोट अटैक था जिस पर कोई भी ऐसी पार्टी नहीं थी जिसने सरकार से सबूत न मांगे हों । जबकि देश की जनता ने मोदी सरकार के इस कदम की सराहना करी लेकिन विपक्ष ने राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर न केवल सरकार को घेरा वल्कि सरकार का मखौल भी उड़ाया विपक्ष की ये भूमिका देश के लिये एक शर्मनाक अध्याय सेे कम नहीं था। वहीं पांच साल के मोदी कार्यकाल में किये गये विकास कार्यों पर विपक्षी पार्टियों के नकारातमक टिपपणी ने जनता के अन्दर आक्रोश और बदले की भावना को जन्म दिया। मसलन सरकार के कार्यों की अनदेखी करके विपक्षी दलों ने अपनी एक जोड़ी आंखों के आगे हजारों आखों को नजर अन्दाज कर दिया जो इन विकास कार्यों को देख रहे थे लिहाजा विपक्ष को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। ये सही है कि विचारधाराओं में मतभेद हो सकते हैं लेकिन देश में हो रहे विकास की तो कम से कम अनदेखी नहीं होना चाहिये। लिहाजा चुनाव परिणामों ने ये साफ कर दिया कि धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाकर अब देश की जनता को इमोशनल ब्लैकमेल नहीं किया जा सकता। देश में कोई भी सरकार तब ही जनमानस में अपनी पैठ बना सकती है जो संविधान,सुरक्षा और सरहद के मामले में कृतसंकल्प हो, ऐसे में देश की जनता ने सभी पार्टियों के पूरे चरित्र की स्कैनिंग करने के बाद महसूस किया कि देश किसके हाथों मे ज्यादा सुरक्षित है। इस तरह की भावनायें आम जनमानस में तब जन्म लेती हैं जब उनका किसी में अटूट चिष्वास होता है ऐसे में देश की सरहद से लेकर संविषान,सुरक्षा और न्याय में नरेन्द्र मोदी सरीखा उन्हें दूसरा कोई नजर नहीं आया।

2019 का लोकसभा चुनाव इक्कीसवी सदी के मुहाने पर खड़े उस सबसे बड़े लोकतंत्र का था जहां से विश्व गुरू बनने की कवायद शुरू हो चुकी थी, इस चुनाव में एक नई उम्मीद की किरण प्रकाशमान होने को आतुर थी जबकि दीगर पार्टियां जातीय समीकरण बैठाने में मशगूल थीं। ये उस दौर का चुनाव था जिसमें देश को एक नायक की जरूरत थी जो देश की दिशा और दशा को बदलने की कुव्वत रखता हो न कि झूठ की बुनियाद पर बनाया गया कोरे आश्वासनों का पुलिन्दा जिसे जनता ने सिरे से नकार दिया। बहरहाल संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद मोदी जी ने अपने संबोधन में विपक्षी पार्टियों द्वारा बनाया गया आर्टीफिशियल भय के माहौल को नकारते हुये कहा कि जिस तरह से देश की जनता ने उन्हें असमान्य जीत हासिल कराई है उससे उनके ऊपर और भी ज्यादा जिम्मेदारी आ गई है। देश का हर वो नागरिक किसी भी धर्म या संप्रदाय का हो सबके उत्थान और विकास की रूपरेखा बनेगी, देश के अन्दर खासतौर से अल्पसंख्यकों के लिए असुरक्षा और भय का माहौल बनाया गया है उसे खत्म करने के लिए वो कृतसंकल्प हैं।ं बहरहाल जनता ने मैन्डेट देकर ये संदेश दिया है कि वो उसी के पक्ष में अपना मतदान करते हैं जो साहसिक निर्णय लेने में सक्षम हो और नरेन्द्र मोदी ने अपने कार्यकाल में ऐसे ही साहसिक निर्णय लिए हैं जो पार्टी हित से ज्यादा देश हित में थे, सही मायने में नरेन्द्र मोदी नायक नहीं महानायक के रूप में कदम रख चुके हैं।

सलीम रज़ा।
स्वतंत्र पत्रकार।
देहरादून,उत्तराखण्ड

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