उत्तराखण्ड के टिहरी जिले के नैनबाग में एक दलित युवक को इस कदर पीटा कि उसकी उपचार के दौरान अस्पताल में मृत्यु हो गई। उस दलित युवक का सिर्फ कसूर इतना था कि उसने एक शादी समारोह में सवर्णों के सामने कुर्सी पर बैठकर खाना खा लिया था क्या ये मानवीय संवेदनाओं की कड़वी सच्चाई नहीं है। सवर्णों को लेकर आये दिन खबरे सुर्खियों में रहती है चाहे वो दलित प्रेम हो या फिर मंदिर में प्रवेश या फिर दलित दूल्हें की घोड़ें पर बारात को सवर्णों के द्वारा न निकलने देना हो लेकिन इन सारे मामलों में तकरीबन एक जैसी ही कहानी नजर आई कि किसी तरह से दलितों को पैरों के तले रौंद दो। दरअसल सियासत की शतरंजी चालों ने इन पर अत्याचार की शिद्दत को और भी बढ़ा दिया है। भले ही सियासत के रणवांकुरे अपने वोटों की लहलहाती फसल काटने के लिए इनके चरण क्यों न घोते हों जो मात्र बाहरी दिखावा और ढ़कोसला मात्र है लेकिन क्या फिर भी दलितों के हालातों में कोई सुधार आया या आने की उम्मीद है शायद नही। सभी दलितों के साथ भेदभाव बरता जाता है उन्हें उनके हकूक से देर रखा जाता है ये सारी बाते कोरे सवालों और झूठी हमदर्दी के तहत बयान की जाती हैं लेकिन इस सच्चाई से भी मुह नहीं मोड़ा जा सकता कि दलित ऊंच-नीच के की श्रेणी में बंटा हिन्दू समाज का ही दर्पण है। जब 1931-32 में गोलमेज सम्मेलन के बाद ब्रिटिश शासकों ने समाज को संप्रदाय के लिहाज से बांटा तो उन्होंने उस समय की अछूत जातियों के लिए एक अलग से अनुसूचि बनाई जिसमें इन जातियों को डाला शायद ही कोई राज्य होगा जहां से दलितों के ऊपर हो रहे उत्तराखण्ड के टिहरी जिले के नैनबाग में एक दलित युवक को इस कदर पीटा कि उसकी उपचार के दौरान अस्पताल में मृत्यु हो गई। उस दलित युवक का सिर्फ कसूर इतना था कि उसने एक शादी समारोह में सवर्णों के सामने कुर्सी पर बैठकर खाना खा लिया था क्या ये मानवीय संवेदनाओं की कड़वी सच्चाई नहीं है। सवर्णों को लेकर आये दिन खबरे सुर्खियों में रहती है चाहे वो दलित प्रेम हो या फिर मंदिर में प्रवेश या फिर दलित दूल्हें की घोड़ें पर बारात को सवर्णों के द्वारा न निकलने देना हो लेकिन इन सारे मामलों में तकरीबन एक जैसी ही कहानी नजर आई कि किसी तरह से दलितों को पैरों के तले रौंद दो। दरअसल सियासत की शतरंजी चालों ने इन पर अत्याचार की शिद्दत को और भी बढ़ा दिया है। भले ही सियासत के रणवांकुरे अपने वोटों की लहलहाती फसल काटने के लिए इनके चरण क्यों न घोते हों जो मात्र बाहरी दिखावा और ढ़कोसला मात्र है लेकिन क्या फिर भी दलितों के हालातों में कोई सुधार आया या आने की उम्मीद है शायद नही। सभी दलितों के साथ भेदभाव बरता जाता है उन्हें उनके हकूक से देर रखा जाता है ये सारी बाते कोरे सवालों और झूठी हमदर्दी के तहत बयान की जाती हैं लेकिन इस सच्चाई से भी मुह नहीं मोड़ा जा सकता कि दलित ऊंच-नीच के की श्रेणी में बंटा हिन्दू समाज का ही दर्पण है। जब 1931-32 में गोलमेज सम्मेलन के बाद ब्रिटिश शासकों ने समाज को संप्रदाय के लिहाज से बांटा तो उन्होंने उस समय की अछूत जातियों के लिए एक अलग से अनुसूचि बनाई जिसमें इन जातियों को डाला गया जो दलित कहलाईं। आज भी भारत में ग्रामीण अंचलों में इस समाज की बहुत सारी जातियां अपनी जाति के मुताबिक पेशा अपनाये हुई हैं लेकिन कई जगह ऐसी हैं कि जहां इस समाज के लोग बहुत हैं ऐसे में उन्हें अपने पेशे को बदलना पड़ा है लेकिन फिर भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपने जातिगत पेशे से उबर नहीं पा रहे हैं। एक और सवाल जहन में उठ खड़ा हुआ है कि इस समाज के ऐर्से भी लोग हैं जो पढ़-लिखकर या तो उच्च पदों पर हैं या फिर अच्छे स्तर के कारोबार से अपना नाम रोशन कर रहे हैं लेकिन इन लोगों ने भी अपने समाज के कमजोर लोगों के लिए कुछ नहीं किया और न ही इनके उत्पीड़न को लेकर उन्होंने अपनी आवाज बुलन्द करी। इसी का परिणाम रहा कि हिन्दू बहुल्य के बीच चाहें दति हिन्दू हो या फिर मुसलमान जुल्म से बचने के लिए अपने धर्म को ही परिवर्तित करके य तो ईसाई बन गये या फिर मुसलमान। तकरीबन दो दशक से उदार आर्थिक नीतियों की वजह से इस समाज के बेहद चिन्ताजनक हो गई ये ही वजह है कि आरक्षित नौकरियों और रोजगार के अवसर न के बराबर रह गये। दलितों पर दिनोंदिन बढ़ रहे जुलमों का कारण हिन्दुत्व का उभार और इनके सत्ता पर काबिज होने की वजह से इनके ऊपर जुल्मों का सिलसिला बढ़ा है। आज जिस तरह के वाक्यात सामने आ रहे हैं उसे देखकर कहा जा सकता है कि संविधान में निहित दलितों के लिए बनाये गये कानून आज भी 7 दशकों के बाद इनकी दशा सुधारने में असरदार साबित होते हुये नहीं दिख रहे हैं। छुआछूत जैसी प्रथा को जिसे अदालत ने असंवैधानिक करार दिया बावजूद उसके ये आज भी पूर्व की तरह ही है। संविधान में इन्हे दिये जाने वाले आरक्षण का मकसद उन्हें ऊपर उठाने के साथ उनकी भलाई करना था लेकिन इसमें भी इक्का-दुक्का लोगों को ही लाभ पहुंचा जिसका परिणाम ये हुआ कि जातीय व्यवस्था के हितैषी इस जातीय बंटबारे को बनाये रखने में कामयाब हुये हैं जो निश्चित रूप से दलितों के लिण् बिल्कुल हितकर नहीं है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि दो हजार साल से भी ज्यादा जिस तरह से आज तक दलितों के साथ जालिमाना बर्ताव किया जा रहा है वो दूसरे देशों की सभ्यता में नहीं देखा गया है। वहीं दलित बुद्धिजीवी इस जातीय व्यवस्था के लिए ब्राहम्ण प्रणाली को दोषी ठहराते हैं वे कहते है कि दलितो के प्रति घृणा,द्वेष,और अमानवीय व्यवहार के लिए धार्मिक स्वीकृति प्रदान थी। फिर जिस तरह से आज मंदिर हों या फिर समारोह जिस तरह से इन पर अत्याचार हो रहे हैं उससे तो ये ही बात साबित होती है जातीय व्यवस्था आज भी जख्मी है। आजादी के बाद बने भारत के संविधान में दलितों के लिए निहित व्यवस्थाये दी तो गई हैं लेकिन आधी-अधूरी प्रक्रिया के चलते ये कारण पैदा हुये है। ये सिर्फ और सिर्फ सियासी अभामंडल में चमकने वाला वो ग्रह है जिसकी जरूरत वक्ती तौर पर सुविधा और समयानुसार होती है उसके बाद गुजरात,उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड, महाराष्ट्र, उत्तराखण्ड जैसे हादसे बराबर होते रहेंगे।

सलीम रज़ा

देहरादून उत्तराखण्ड

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *