कारगिल विजय दिवस हर साल 26 जुलाई को मनाया जरता है।यह दिन कारगिल युद्ध में शहीद हुये भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजली स्वरूप शोर्य दिवस के रूप में मनाया जाता है । जिन्होंने दुश्मन देश से लड़ते-लड़ते अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। ये सच है कि योद्धा पैदा नहीं होते वल्कि योद्धा बनाये जाते हैं और हमारी भारतीय सेना योद्धा बनाती है। हमारी भारतीय सेना इसकी मिसाल है और हमें अपनी सेना पर गर्व है। हम लोग कारगिल नाम को जानते हैं लेकिन हमारे वीर जवान किन परिस्थितयों में वहां रहकर देश की रक्षा करते है, उसे देख और सुनकर हमारा सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है। कारगिल युद्ध की जरूरत क्यों हुई ये जानना जरूरी है। 1980 के दशक में दोनों देशों के दरम्यान होने वाली छिटपुट घटनाओं और फिर 1990 के दशक के दौरान काशमीर में अलगाववादी सरगर्मियों के बढ़ने से पैदा हुये हालातों ने एक अजीब सा माहौल घाटी में बना दिया था ,जिसमें पकिस्तान का रोल अहम माना जा रहा था।
धीरे-धीरे घाटी के हालात और भी ज्यादा खराब हो गये ये 1998 का दौर था जब दोनों देश अपनी-अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन करने की होड़ में लगें थे इसी दौर में दोनों देशों ने परमाणु परीक्षण करके इस बात का संकेत दे दिया कि वो किसी भी हालात से निपटने के लिए सक्षम हैं। शान्त घाटी के अन्दर आतंकी सरगर्मिया तेज हो गई और दोनों देशों के बीच हालात युद्ध जैसे उत्पन्न हो गये। दोनों देशों के बीच पनपे तनाव पूर्ण माहौल के मद्देनजर पहल के तौर पर भारत ने 1999 में अटल जी के प्रयासों से लाहौर घोषणा पत्र पर कशमीर के शान्तिपूर्ण समाधान के लिए द्विपक्षीय समाधान का वादा किया गया था। इस समझौते के बावजूद पाकिस्तान अपनी हरकतों से वाज नहीं आया, वल्कि और तेजी के साथ भारत पर युद्ध करने की मंशा पाले पाकिस्तान ने अपने सैनिकों को सरहद के पास प्रशिक्षण देने लगा था। इसी के साथ ही पाक ने अपने सैनिकों की घुसपैठ घाटी में शुरू करा दी और इसे कोड दिया ‘‘अॅापरेशन वद्र’’ दरअसल पाकिस्तान की सोच भी थी कि इस तरह का तनाव करके वो कशमीर मुद्दे को इन्टरनेशनल लेबल पर लाकर खड़ा कर देगा, जिससे इसका हल और आसान हो जायेगा। पाकिस्तान हमेशा से घाटी के अन्दर उथल-पुथल बनाये रखने का कायल रहा है ,क्योंकि पाकिस्तान हमेशा कशमीर को टरगेट पर रख कर भारत से बदला लेने की फिराक में रहता है। नियंत्रण रेखा पर बढ़ रही मुसलसल हलचल से भारत को इस बात का अहसास हो गया कि पाकिस्तान की मंशा ठीक नहीं है और वो भारत के खिलाफ बड़े हमले की कोशिश में लगा हुआ है।पाकिस्तान के सैनिको और पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों के साथ नियंत्रण रेखा पार करके भारत के अन्दर घुस कर कई पहाड़ी और ऊंचाई वाली चोटियों पर कब्जा करके लेह और लद्दाख के रास्ते पर नियंत्रण करने के साथ सियाचीन ग्लेशियर पर कब्जा करके भारत को कमजोर बनाना था। जो भारत ने इसे भांप लिया और तकरीबन दो लाख फौज के साथ पाकिस्तान को जबाव देने की ठान ली और इसे नाम दिया ‘‘आपरेशन विजय’’। तकरीबन दो महीने तक चले इस युद्ध में भरतीय थल सेना और वायु सेना ने नियंत्रण रेखा का उल्लंघन न करते हुये हिन्दुस्तान की सरहद में घुस आये आक्रमणकारियों को देश की सीमा से बाहर खदेड़ दिया। कारगिल युद्ध में तकरीबन 600 के आसपास हिन्दुस्तान के वीर योद्धा शहीद हुये और 1300 से ज्यादा ज़ख्मी हो गये। कारगिल युद्ध में शहीद हुये वीर सैनिकों में कुछ ऐसे भी मां के लाल थे जिनकी आयु 30 साल के आसपास ही रही होगी। बेशक इन शहीदों ने भारतीय सेना के शौर्य और बलिदान की परम्परा को कायम रखा जिसकी शपथ हर जवान भारतीय तिरंगे के नीचे लेता है। कारगिल युद्ध के वो लम्हात कैसे और किस तरह शहीद सैनिकों के परिवार वालों ने सहे होंगे जिनका बेटा जिनका पति जिनका भाई जिनका पिता अपने लोगों से घर लौटकर आने का सच्चा वादा करके गया था। ये वादा सच्चा जरूर था वे अपने-अपने घर लौटे जरूर लेकिन लकड़ी के ताबूतों में उसी तिरंगे झण्डे में लिपटे हुये जिसके नीचे उन्होनें हिन्दुस्तान की अस्मिता को बचाने की शपथ ली थी। कैसा मंजर होगा जब सैनिक का सिर इस तिरंगे के आगे सम्मान से झुका होता है और वही तिरंगा उनके शरीर से लिपटा उनकी गौरव गाथा कह रहा था। इस साल 26 जुलाई को कारगिल युद्ध की वीसवीं वर्षगांठ मनाई जा रही है इसे शौर्य दिवस के ढप में भारत के हर राज्य में मनाया जाता है, बीस साल के लम्बे अन्तराल के बाद आज भी कारगिल की बर्फ से लखदख पथरीली चोटियां खामोश हैं लेकिन इन पहाड़ियों पर दुश्मन देश पाकिस्तान की सेना का गोला बारूद भारतीय रणवांकुरों की विजय गाथा की कहनी बयां कर रहा है। यह बिखरा पडा सामान इस बात का गवाह है कि ऊंची चोटियों पर घात लगाकर बैठे पाक सैनिकों को किस तरह अपना सामान छोडकर भागना पड़ा होगा। ये हमारे सैनिकों के अंतिम हमले दृश्य जरूर होगा। बहरहाल हमारे देश का इतिहास सैनिकों की वीर गाथाओं से भरा पड़ा है, नमन है उन वीर शहीदों को जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर हिन्दुस्तान की आन वान और शान को कायम रखा, और पाक के ना‘’पाक मंसूबों को नाकाम करके अपने सरहद की हिफाजत की बस उनकी स्मृति में ये ही शेष है। ‘‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगेे हर बरस मेले। वतन पर मरने वालों का वाकी यही निशां होगा’’।

जय हिन्द! रुद्र भारतसत्य

सलीम रज़ा लेखक

देहरादून,उत्तराखण्ड

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