देश में 17 वीं लोक सभा के लिये चुनाव संपन्न हो चुके हैं, और सभी छोटी-बड़ी पार्टियां गुणा-भाग में लग गई हैं। चुनाव नतीजों से पहले चल रहे एक्जिट पोल की अगर बात मानी जाये तो इस बार का चुनावी सर्वे दिल्ली के सिंहासन पर मोदी की ही ताजपोशी करवा रहा है। भारतीय जनता पार्टी अगर दोबारा सत्ता में आ जाती है तो देश के अन्दर कैसे -कैसे हालात उपजेंगे इस पर चर्चा बाद में करूंगा लेकिन सबसे पहले संपन्न हुए इस चुनाव में जैसे हालात देखें वो हिन्दुस्तान ऐसे बड़े लोकतंत्र के लिए किसी भी मायने में शुभ संकेत नहीं कहे जा सकते। वो इस लिए कि 17 वीं लोकसभा का चुनाव बद अखलाकी यानि की बदजुबानी के लिए ज्यादा मशहूर हो गया। इस चुनाव में किसी एक ने बदजुबानी नहीं कि वल्कि हर कोई इसमें बढ ़चढ़कर हिस्सा लेने से चूका भी नहीं।इस मर्तबा की बदजुवानी शायद लम्बे समय तक कोई भूल भी नहीं पायेगा।

नेताओं में जिस तरह से बदजुबानी का कम्पटीशन चल रहा था उसे देखकर ये मानने को मजबूर होना पड़ा कि ये सब कुछ सोची समझी साजिश के तहत ही किया जाता रहा है। कितने अफसोस की बात है कि ऐसे फूहड़ और भद्दे बयान देने में महिला नेतां भी अपने आप को पीछे क्यों रखतीं। इन महिला नेताओं या पुरूष नेताओं को इस बात का जरा सा भी ख्याल नहीं रहा कि लोकतंत्र में उनकी छवि पर क्या असर पड़ेगा। चाहें इसमें माया हो राहुल हों ममता हों या फिर अमित शाह और मोदी क्यों न हों किसी ने भी कोताही नहीं करी। इस पूरे मामले में कहा जाये भाजपा अछूती रही है तो ये सबसे बड़ी भूल है। 2014 के चुनाव के बाद जब भाजपा सत्ता में आई तो भाजपा के संासद और विधायक की तरफ से ही बिगड़े बोल शुरू कर दिये थे इनमें सुर्खियों में रहने वाले साक्षी महाराज के साथ गिरिराज सिंह, उमा भारती, साध्वी निरंजन ज्योति हों या फिर संगीत सोम जिन्होंने भाजपा की सरकार बनते ही देश के अन्दर एक जहरीले माहौल को जन्म दिया जिससे लगने लगा कि सच में लोकतंत्र को खतरा है। वो इसलिए भी माना जाने लगा कि लोगों के दिमाग में ये बात घर करी हुई थी कि भारतीय जनता पार्टी हिन्दुत्व की पार्टी है फिर उस पर भाजपा नेताओं के विवादित बयानों ने मुहर लगा दी।

उसी के बाद से एक आवाज आई कि लोकतंत्र को भाजपा से खतरा है। बहरहाल इस बात से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है लेकिन सही भी नहीं है क्योंकि ऐसे विवादित बयानों से लोकतंत्र सहमा और डरा हुआ जरूर लगता है। अब तो सिर्फ 23 तारीख का इन्तजार है और सियासी गलियारों के साथ-साथ हर शहर के गली मुहल्लों में इस बात की चर्चा का बाजार गर्म है कि 17 वीं लोकसभा चुनाव के बाद कौन सरकार बनायेगा। हर जगह अटकलों का बाजार गर्म है लोग टी.वी चैनल्स के सामने नजरें गड़ाये बैठे एक्जिट पोल पर चुनावी गणित लगा रहे हैं सटटा बाजार भी तेजी के साथ ऊपर नीचे अठखेलियां खेल रहा है। इसी को लेकर जोड़-तोड़ की राजनीति भी अपनी राह पर तेजी से दौड़ रही है। सात चरणों के मतदान संपन्न हो गये लेकिन इस पूरे चुनाव में न तो कोई लहर ही दिखी और न ही कोई विकास से मुत्तालिक कोई नारा ही सुनाई दिया। इस ऊबाऊ चुनावी कार्यक्रम में सलेजिंग दिखाई दी जो इूसरी विपक्षी पार्टियों के मनोबल को गिराने वाली दिखी। वैसे भी 2019 का चुनाव 2014 जैसा बिल्कुल भी नहीं था। हां सोशल मीडिया ने जरूर चुनाव को एकतरफा साबित करके एक्जिट पोल को भी पीछे छोड़ दिया है।

भले ही पार्टी के नेता या गठबन्धन के लोग अपने-अपने बहुमत के दाबे क्यों न कर रहे हो लेकिनउन्हें भी इस बात का आभास हो गया है कि सही तस्वीर तो ई.वी.एम के ख्ुलने के बाद ही दिखेगी। चलिए अगर मान ही लिया जाये कि देश में भाजपा की सरकार बनेगी तो अमित शाह और मोदी का दावा सही निकलेगा जिसमें उन्होंने 300 से ज्यादा सीटों का दावा किया था। इस बात का कयास लगाया जा रहा है कि फिर छोटी-बड़ी पार्टियां भी इनके साथ गठबन्धन करने में अपने आदर्शों और विचारधाराओ ंको मझधार में ही छोड़ देंगी। ऐसे में कहा जा सकता है कि स्पष्ट बहुमत के साथ गठबन्धन वाली सरकार मजबूत और टिकाऊ होगी इसमें कोई शक नहीं है। अगर ऐसा हुआ तो इस सरकार का नेतृत्व भी अमित शाह और नरेन्द्र मोदी ही करेंगे। एक बात और जेहन में है कि अगर भाजपा की सरकार बनती है तो सरकार में नेता तो वही पुराने होने चाहिए लेकिन नीतियां अलग होगी इसमें कोई दो राय नहीं है। इस बार भाजपा सरकार के रवैये में भी बदलाव देखने को मिल सकता है इस बार 2016 से नोटबन्दी से कराह रही जनता को दोबारा ये दंश झेलने को नहीं मिलेगा साथ ही देश की अर्थनीति के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य नीति पर भी ठोस कदम उठाये जाने की उम्मीद है।साथ ही अपनी विदेश नीति में भी एहतियात के साथ कदम उठायेगा इन सब बातों में प्रधानमंत्री की भूमिका सर्वोपरि होगी ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है।

2014 से अब तक जो भी गल्ती सरकार से हुई उसे न दोहराकर विशेषज्ञों की राय लेकर अमलीजामा पहनाने की कोशिश करी जायेगी। लेकिन एक मत ये भी है कि प्रचन्ड बहुमत के गुरूर में कहीं सरकार के कारिन्दे अहंकारी न हो जायें ऐसे में हिटलरशाही वाले फरमान देश के अन्दर अराजकता का माहौल भी पैदा कर सकते है। ं जैसा कि कांग्रेस नीति इन्दिरा गांधी के शासन काल में हुआ था जिसमें लोगों को आपातकाल ऐसे भयावह हालात का सामना करना पड़ा था। दूसरे हालात इससे भी ज्यादा बदतर नजर आ रहे हैं वो ये कि अगर मान लिया जाये भाजपा सत्ता का जादुई आंकडें से दूर रहती है ऐसे में वो छोटी पार्टियों से गठबन्धन करके सरकार बनाती है तो संसदीय दल का नेता कौन होगा इसलिए पार्टी और गठबन्धन के नेता भी चाहेंगे कि उनका नेता अलग छवि का हो। दूसरी तरफ यदि कांग्रेस को 100 से ऊपर सीटें मिल गईं और कांग्रेस ने सभी दलों को मिलाकर सरकार बनाने का दावा भी किया तो राहुल गांधी को तो शायद कोई भी नहीं चाहेगा कि वो प्रधानमंत्री बने ऐसे में गठबन्ध के नेताओं में से किसी एक की बात चलेगी तो वहां भी जूतम पैजार बाले हालात पैदा हो सकते है। ये ही हालात चैधरी चरण सिंह और देवगौड़ा सरकार के हुये थे। बहरहाल जिस तरह का सियासी माहौल है हर कोई अहंकार की चादर लपेटे हुये है ऐसे में सब दलों को मिलाकर सरकार बनाना टेढ़ी खीर है। अब देखना ये है कि जो सरकार हमें मिलने वाली है वो आगामी पांच साल तक भारत को किस दिशा में ले जायेगी ये पांच साल हमें एक स्थाई सरकार भी दे सकते हैं या फिर देश की जनता एक और आपातकाल ऐसे हालात से निपटने के लिए तैयार रहे।

सलीम रज़ा
स्वतंत्र पत्रकार,
देहरादून उत्तराखण्ड

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