देश के अन्दर अब सिर्फ एक ही चर्चा चारों ओर है कि ऐसा क्या चमत्कार हुआ जिसने भाजपा को और भी ऊंचाईयों पर पहुचा दिया। चुनावी विश्लेषक भी हैरान और परेशान हैं, लेकिन जवाब नहीं तलाश मिला। चुनावी घोषणा के साथ ही देश-विदेश के चुनावी रणनीतिकार अपनी-अपनी मटर भुना रहे थे,ं कोई मोदी की नीति को गलत बताकर नुकसान का आंकलन कर रहा था तो कोई मोदी को हिन्दुवादी चेहरा बताकर चुनाव में होने वाले नुकसान पर गुणा-भाग करके शेष के रूप में बचे हुये नुकसान को भारतीय जनता पार्टी की पराजय की शक्ल में देख रहा था। सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक मंचों तक भाजपा कार्यकर्ताओं को मोदी भक्त अन्धभक्त बताने वाले लोग ये अन्दाजा लगाने में नाकाम दिखे कि जो कुछ भी घटित हो रहा है उसका संदेश क्या है ये ही सबसे अहम और बड़ा सवाल था। एक तरफ महागठबन्धन में सभी घटक दलों को एक साथ आ जाने से भी चुनाव को समझाने में माथापच्ची करनी पड़ी अन्ततः ये ही निषकर्ष निकलकर सामने आया कि महाबठबन्धन मिलकर चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के चुनावी रथ को बीच रास्ते में रोक देगा।

बस ये ही सभी की सोच का केन्द्र बिन्दु बन कर रह गया जिससे चुनावी गणित हासिल खो बैठा गणित के जोड़-घटाने में हासिल का बड़ा महत्व होता है ये हासिल कैसे छूट गया इसे जानना भी बहुत जरूरी है। दरअसल उत्तर भारत के सबसे बड़े सियासी कुरूक्षेत्र कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश से सियासी गणित का हासिल जो छूटा उसने पूरे हिन्दुस्तान में जाकर सैकड़े का फर्क डाल दिया और वो था महागठबन्धन जिसमें सियासी रणनीतिकार फंस गये थे।
दरअसल इस महागठबन्धन के पलड़े में पिछड़े, दलित और मुसलमान वोटों को जाने की संभावनाओं को बगैर जांचे परखे निश्चित जीत का परिणाम देखने वाले ये भी भूल गये कि जनभावना का रसायन सूत्र तो महागठबन्धन के पास है ही नही,ं बस सारे कयास औंधे मुंह धड़ाम होते नजर आये। इस पूरे चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का कोई भी छोटे से लेकर बड़ा लीडर विकास की बात करते हुये नजर नहीं आया, जबकि मोदी सरकार के सौ दिन मुकम्मल होने के बाद से ही विपक्ष की तरफ से प्रहार किये गये कि विकास पैदा ही नहीं हुआ वगैरा-वगैरा। वहीं भाजपा के चरिेष्ठ नेता का भी कहना था कि चुनाव काम से नहीं भावनात्मक मुद्दों से जीते जाते हैं।

इस बात में दम तो था क्योंकि उसके बाद पुलवामा अटैक और फिर वालाकोट पर हुई सर्जिकल स्ट्राईक के बाद देश से मिला अपार जनसमर्थन एक ऐसा इमोशन ट्रैक था जिसे मोदी जी ने मजबूती के साथ मुठ्ठी में कैद करके रखा था , इसी का नतीजा था कि खुद प्रधानमंत्री मोदी ने विकास के गीत नहीं गाये उनका अटैक था तो सिर्फ देश की सुरक्षा, पाकिस्तान और राष्ट्र का गौरव और देश को काग्रेस की वंशवाद की नीति से हुये नुकसान पर ही रहा, जबकि लाजिकल एबीलिटी रखने वालों ने इसे कोरा और सरकार की असफलता का तमगा देकर भाजपा को सत्ता द्वार तक न पहुंचने देने वाला संदेश दे डाला। लेकिन इस बात पर किसी ने फोकस नहीं करा कि पांच राज्यों में हुये विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिली हार के बाद भी हिन्दी पट्टी से ही नारा निकला था ‘बसुन्धरा तेरी खैर नहीं मोदी से कोई बैर नहीं’ ये वो संदेश था जिसकी खोज में लगे बुद्धिजीवी और लाजिकल एबीलिटी रखने वाले फैक्ट चैक के चक्कर में इमोाशन नजर अन्दाज कर गये फैक्ट चैक सिर्फ उस पर था जिन योजनाओं को मोदी सरकार ने शुरू किया था, जैसे उज्जवला गैस योजना ,जन-धन योजना, स्वच्छ भारत अभियान, हर घर शौचालय, प्रधानमंत्री आवास योजना और मुद्रा लोन जो फैक्ट चैक के चक्कर में कमियों से भरे नजर आये, लेकिन आमजन को ये लगने लगा भले ही अभी उन्हें इसका पूरा लाभ नहीं मिल रहा है।

लेकिन ये है दूरगामी जरूर तभी तो युवा मतदाताओं में इस बात को लेकर क्रेज था कि रोजगार नहीं लेकिन फिर भी मोदी चाहिए ये देश के मतदाताओं की मोदी के प्रति भावना थी जो अप्रत्यक्ष रूप से मोदी के दोबारा आगमन को संकेत थीं। देश के हर व्यक्ति को इस बात का आभास हो रहा था कि मोदी के हाथों में ही देश सुरक्षित है ये ही वो व्यक्ति है जो देश को सही रास्ते पर ले जाने का दम रखता है। वहीं विपक्ष मोदी के पांच साल में किये गये कामों की असफलताओं की बेमेल स्क्रिप्ट मतदाताओं को सुना रहे थे जिससे चुनाव में हार जीत का आंकलन करना विश्लेषकों के लिए कठिन काम हो गया था। दरअसल मोदी एण्ड पार्टी जो पूरे देश में वन मैन आर्मी शो यानि मोदी जी आम जनमानस की भावनाओं को रि-स्टोर और री-साईकलिंग करके मतदाताओं के भावनाओं की कलम से सियासी पटकथा लिख चुके थे। जिसकी खबर न तो विपक्ष को ही लगी और न ही चुनाव विश्लेषकों को बस ये ही कारण था कि मोदी के खिलाफ लामबन्द हुये विपक्ष और चुनावी विश्लेषकों द्वारा गठजोड़ करके बनाये गये आड नम्बर को इवन नम्बर में बदल कर दिखा दिया कि अबकी बार त्रिशंकु सरकार लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि ग्रेविएशन को समझने की काबलियत हर किसी में नहीं होती जिनमें होती है वो विरले ही होते हैं जैसे नरेन्द्र मोदी जिन्होंने ग्रेविएशन को समझा और उसकी पालीटिकल टैपिंग करने की एवीलिटी को दिखाया उसमें रैशनलिज्म और तर्कवादी सोच रखने वालों को दिखा दिया कि भावनाओं की राजनीति में लाजिकल थाटस कोई मायने नहीं रखते। बहरहाल कल सम्भवतः मोदी मंत्रीमंडल के शपथ ग्रहण में मौजूद मेहमानों के चेहरे बता देंगे कि लाजिकल और पालीटिकल टेपिंग का खेल क्या होता है, लेकिन इतना जरूर है मोदी की केमिस्ट्री एक मिस्ट्री बन गई जिसने चुनावी गणित को धाराशायी करके रख दिया।

सलीम रज़ा
स्वतंत्र पत्रकार
देहरादून,उत्तराखण्ड

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