जाने-अनजाने हम सभी जन-चेतना के निर्माण में अपना योगदान देते रहते हैं। सार्वजनिक जीवन की यह एक अनिवार्य प्रक्रिया है। हमारा सामाजिक दायरा जितना बड़ा होता है, हमारा प्रभाव जितने ज्यादा लोगों पर होता है; वहीं हमारी सामाजिक चेतना का पैमाना बनता है।

हमारी *समग्र सामाजिक चेतना* भी इसी जन-चेतना का विस्तृत स्वरूप होती है। हलांकि, यह *जन-चेतना या समग्र सामाजिक चेतना या विचारधारा* कितनी सकारात्मक और प्रगतिशील है, उसी पर निर्भर होती है *सामाजिक गति, प्रगति और उन्नति।*

हम में से हर कोई, इस जन-चेतना के निर्माण में अपनी भूमिका रखता है। जो मुख्य विंदु इसके प्रभाव क्षेत्र का निर्धारण करते हैं, वह हैं: *सामाजिक सौहार्द, परस्पर सम्मान का भाव, समरसता, जन सहयोग, नेतृत्व, संवाद, साहित्य, सहकारिता, आजीविका, सांस्कृतिक आयोजन और सामूहिक समस्याओं के निराकरण के लिए प्रयासों के प्रति संवेदनशीलता।*

यदि हम सकारात्मक होंगे तभी अपनी पाशविक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखने में सफल होंगे और मानवीय मूल्यों का महत्व समझने की क्षमता का विकास कर सकेंगे।

अपने लिए जीने से ज्यादा महत्व जब हम अपनों के लिए जीने पर देते हैं तभी हम अपनी *सृजनात्मकता और सकारात्मकता का साक्षात्कार* कर पाते हैं। यही नहीं, इस दिशा में किए जा रहे प्रयास; हमारे अपने-पन का दायरा भी निरंतर बढ़ाते रहते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति का *सम्यक आंकलन* भी जन-चेतना या समग्र सामाजिक चेतना में उनके योगदान के आधार पर ही किया जाता है। इसीलिए कहा जाता है कि *विचार* का महत्व *व्यापार* से ज्यादा होता है। व्यापार का प्रभाव व्यक्ति के जीवनकाल तक सीमित है तो वहीं विचार का प्रभाव चिरकाल तक रहता है। हमारी यही समग्र सामाजिक चेतना प्रगैतिहासिक काल से मानव विकास की धुरी रही है।

।।भवतु सब्ब मंगलम्।।

लेखक धीरेन्द्र सिंह गंगवार शिक्षक

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