ससियासत भी अजीबो-गरीब चीज है, ये जितने रंग बदलती है उसे देखकर शायद गिरगिट को भी अपने ऊपर शर्म आने लगे। खैर ये जो सियासत में तेजी के साथ घटनाक्रम घट रहा है वो दरअसल सियासत के मुख पृष्ठ की आवरण कथा जैसा है। अब आप खुद देखिये इस चुनाव में जिस तरह से अन्तहीन और दिशाहीन मुद्दे उछाले गये हैं जिनका न तो लोकतंत्र से कोई सरोकार है और न ही मतदाता को इससे कोई फायदा होने वाला है। कहते हैं किसी भी चीज की अति महत्वाकांक्षा इंसान को प्रगति के रास्ते से उतार देती है। आज जो कुछ भी चुनाव में इस्तेमाल किया जा रहा है वो सच में बेहद शर्मनाक है। सियासी मंचों पर जिस तरह से एक दूसरे के चरित्र का बखान किया जा रहा है उसे देखकर ऐसा लगता है सियासत के रोल माडल कहलाने वाले लोग खुद निम्न स्तर की सियासत के दलदल में फंस चुके हैं।

चुनावी मंचों पर एक दूसरे के चरित्र की पोल पट्टी खोली जा रही है अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल खुलेआम किया जा रहा है। चुनावी समर में अहंकार में डूबे सियासत के रण्नीतिकार जो आने वाले समय में इतिहास के पन्नों पर किसी तारे की तरह शोभायमान हो जायेंगे वर्तमान में महिलाओं का वाक्ययुद्ध से चीरहरण करने पर उतारू है। ये सियासत की कुर्सी पर शोभायमान होने का एक नायाब तरीका नजर आया इस चुनावी संग्राम में जिसके अन्दर मुद्दे गौण हो गये । जिसकी काफी लानत-मलानत भी की जा रही है ,लेकिन इससे उन्हें कोई भी फर्क पड़ने वाला नहीं है। खैर अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल इस चुनाव में किया जा रहा है ये नया नहीं है इससे पहले भी कई मर्तबा अमर्यादित और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया जा चुका है लेकिन इस बार हद कुछ ज्यादा ही पार कर चुकी है। मुख्य मुद्दे की बात की जाये तो इस बार चुनाव में मुख्य मुद्दा तो कोई नहीं है हां हिन्दु-मुस्लिम एक ऐसा मुद्दा बन गया जो वर्तमान दौर की सियासत में खूब फल-फूल रहा है। अमूमन देखा जा रहा है कि मौजूदा सरकार ने इस मुद्दे को जमकर कैश करा है खासतौर से मुस्लिम महिलाओं के लिए लाया गया तीन तलाक बिल। इस बिल के पारित होने के बाद मुस्लिम महिलाओं ने मोदी के समर्थन में अपनी उपस्थिित दर्ज कराई थी,भारतीय जनता पार्टी ने बड़ी तादाद में मुस्लिम महिलाओं के मिल रहे समर्थन को चुनावी जनसभाओं में जमकर कैश किया था।

लेकिन अभी हाल ही में श्रीलंका में ईस्टर के दिन हुये सिलसिलेवार बम धमाकों के बाद श्रीलंका सरकार ने जिस तरह से मुस्लिम महिलाओं के बुर्का पर पतिबंध लगाने का फरमान जारी किया तो जाहिर सी बात है इसका असर एशिया महाद्वीप के दूसरे बड़े देश भारत पर तो पड़ना ही था। इसलिए वो राजनीतिक पार्टियां जो हिन्दुत्व का चोला ओढ़े है उन्होंने इस मुद्दे को उछालने की कोशिश भी करी लेकिन भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे पर बैकफुट पर ही दिखी ऐसा क्यों ? पानी पी-पीकर इस्लाम को निशाना बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी इस बुर्के जैसी उनकी नजर में कुप्रथा से किनारा क्यों कर गई ? क्या ये मुस्लिमों के हितैषी होने का संकेत है मेरी समझ से शायद नहीं। भारतीय जनता पार्टी की इस मुद्दे से किनारा करने की बजह है और वो बजह है बहुसंख्यकों में सदियों से चली आ रही घुघट प्रथा दोनों ही प्रथाये ऐसी है जिसके अन्दर रहने वाले का चेहरा दिखाई नहीं देता है , इस लिहाज से दोनो ही बातों पर बहस और चर्चा होनी चाहिए। लेकिन चुनावी धमाचैकड़ी के बीच भारतीय जनता पार्टी और उसके कारिन्दे इस पूरे मामले को दबाने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं। इन नेताओं को मालूम है कि अगर इस मामले को जरा सी भी हवा दे दी तो बेशक उनकी हवा निकल सकती है।

वो यूं कि हमारे देश में संस्कृति और सभ्यता का बोलबाला है , भले ही आज पाश्चात्य सभ्यता ने अपने पांव पसार लिए हों लेकिन फिर भी हिन्दुस्तान के लोग अपनी संस्कृति और सभ्यता की पूरे विश्व में मिसाल बने हुये हैं। कितना दुःखद है कि जब भी कोई आतंकी कायराना हरकत देश या देश से बाहर होती है तभी समूचे विश्व के रडार पर इस्लाम ही होता है, ऐसे माहौल में वो मुसलमान प्रभावित होता हैे जिसका इससे दूर-दूर तक वास्ता नहीं होता लेकिन फिर भी मुस्लिम ही दोषी है क्यों ? बहरहाल जब बात बुर्के की चली है तो ये भी बता देना जरूरी है कि बुर्का और पर्दा दोनो ही वह पहलू हैं जिस पर बहस होनी चाहिए क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में दोनों ही प्रभावित करते हैं फिर बुर्के पर ही जोर क्यों?। क्या ये सियासी अवधारणा मुस्लिमों को छिन्न-भिन्न करने की तो नहीं या समूचे हिन्दू राष्ट्र का अघोषित संकेत ?।

खैर इस्लाम में कुरान के मुताबिक महिलाओं को परदा आया है जिसमें नकाब और हिजाब है ये कोई परम्परा नहीं है। लेकिन इस बार बुर्के पर उठी आवाज पर भाजपा के सहयोगी शिव सेना के साथ खुद साध्वी प्रज्ञा ने बुर्के पर बैन लगाने का समर्थन किया था, लेकिन भाजपा इस बात को लेकर खामोश ही रही या यूं कह लें सियासी नजाकत को देखकर बीजेपी बैक फुट पर दिखी। उसके बैकफुट पर रहने के दो कारण थे एक तो देश के अन्दर लोकसभा चुनाव चल रहे थे दूसरे भाजपा को डर था कि ण्ेसे नाजुक वक्त में अगर वो बुर्का बैन करने पर अपनी आवाज बुलन्द करते हैं तो घुंघट पर भी लोग उंगली उठायेंगे। जाहिर है हिन्दंस्तान में कई ऐसे प्रदेश हैं जहां आज भी बहुतायत में हिन्दू महिलायें घुंघट करती हैं, लिहाजा चुनाव प्रभावित होगा और इसका खामियाजा भाजपा को ही भुगतना पड़ेगा। ये बात सही है अगर देश में चुनावी माहौल न होता तो बेशक भाजपा इस मुद्दै को लेकर श्रीलंका के साथ दोस्ताना रवैया अपनाते हुए उसकी सुर में सुर मिलाकर इसको सियासी रंग देने से नहीं चूकती। बहरहाल बुर्का हो या घंूघट ये भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रतीक हैं इसे लेकर सियासत होना किसी भी मायने में सही नहीं है । लेकिन देखा ये जा रहा है कि चाहे किसी भी धर्म की महिला हो वो अपने आप को बंधा हुआ देखना नहीं चाहती अमूमन देखा जा रहा है कि बहुत सी नई जनसंख्या इस प्रथा को अपने ऊपर जबरदस्ती थोपा गया धर्मिक आडम्बर समझती हैं। ये ही वजह है कि आज मुस्लिम समाज की लड़कियां भी स्कूल कालेजों में बुर्के को कम ही अपना रही है,,ं लेकिन हिजाब में रहना कोई बुरी बात भी नहीं है इससे हम अपने संस्कारों को जीवित रखकर धार्मिक पहचान बनाये रखने की कोशिश करते है।ं लिहाजा इन सारी बातों को जो धर्म और संस्कृति से जुड़ी हों उस पर सियासी रंग चढ़ाना ठीक नहीं है। कहने का मतलब साफ है कि भले ही बुर्के और घूंघट को राष्ट्रीय सुरक्षा के चश्मे से भाजपा देखने की कोशिश कर रही हो लेकिन लेकिन समय की सियासत ये ही कहती है कि अगर जिस मुद्दे पर वोट बैंक की फसल को नुकसान पहुंचता है तो उस मुद्दे से किनारा करना ही समझदारी है जैसाा की भाजपा ने किया है।

  • सलीम रज़ा।स्वतंत्र पत्रकार।

स्वतंत्र पत्रकार।

देहरादून उत्तराखण्ड।

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