लोकसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं और अब निगाह है तो सिर्फ मतदान के परिणामों की। चुनावी सर्वे और एक्जिट पोल तो ये ही बता रहे हैं कि देश में एक बार फिर भगवा ध्वज फहरेगा,यानि दिल्ली के सिंहासन पर एन.डी.ए. सरकार बनायेगा। कितना हैरत भरा नतीजा होगा अगर ऐसा हुआ? इस बात की शायद ही किसी को उम्मीद होगी, क्योंकि ये किसी अनहोनी की तरह होगा। इस बात का स्मरण हो कि मोदी सरकार को घेरने के लिए विपक्षी दलों ने नोटबन्दी,जी.एस.टी.,किसान समस्या,रोजगार जैसे मुद्दों को प्रमुख हथियार बनाया था। इतना ही नहीं सी.बी.आई. को लेकर भी विपक्ष ने सरकार की घेराबन्दी करी थी। आर.बी.आई. और सरकार के बीच हुई नूराकुशतीश्पर भी विपक्ष ने सरकार के मंसूबों पर सवाल उठाये थे। इसी सरकार के कार्यकाल में उच्चतम न्यायालय के न्यायधीशों के द्वारा सरकार पर कामकाज में दखल देने के लिए प्रेस वार्ता करी थी जो शायद देश के इतिहास में पहली बार देखने को मिला था, उस पर भी सभी विपक्षी दलों ने एक साथ मोदी सरकार पर हमला बोला था।

ये ही वजह थी कि हाल ही में देश के अन्दर हुये पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव परिणामों में भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा। इन चुनाव परिणामों को देखने के बाद एकजुट हुए विपक्षी दलों को लगने लगा कि आने वाले लोकसभा चुनाव में भी इन्हीं हथियारों के सहारे वो मोदी सरकार को बाहर का रास्ता दिखाने की क्षमता रखते हैं। इसे अति उत्साहित (ओवर कान्फिडेन्स) ही कहा जाये तो बेहतर ही होगा। लेकिन फिर भी ये लगने लगा था कि एकजूट होता मजबूत विपक्ष अमितशाह और नरेन्द्र मोदी की जोड़ी पर भारी पड़ेगा लेकिन ज्यों-ज्यों लोकसभा चुनाव करीब आते गये विपक्ष में एक अलग तरह का बिखराव देखने को मिला इसे चाहें तो सत्ता की भूख कह लीजिए या वर्चस्व की जंग।

लोकसभा चुनाव के पहले ही चरण में समूचा विपक्ष या यूं कह ले महागठबन्धन बिखरा-बिखरा नजर आने लगा विपक्ष के इसी बिखराव का फायदा देखा जाये तो सीध-सीधा भारतीय जनता पार्टी को मिला, जैसे कि चुनाव संपन्न होने के बाद एक्जिट पोल बता रहे हैं। भले ही गठबन्धन ने मिलकर मोदी के खिलाफ कैमिस्ट्री का कोई भी सूत्र तैयार किया हो लेकिन सात चरण के मतदान के बाद ये कहा जा सकता है कि पूरे महा गठबन्धन के ऊपर मोदी का गणित भारी पड़ता नजर आ रहा है। आपको ये भी बताना जरूरी है कि हाल ही में हुये पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों के वक्त राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन बिखरा-बिखरा नजर आया लेकिन लोकसभा चुनाव के वक्त इसमें एकजुटता दिखी जिसमें दृढ संकल्प था और वहीं विपक्ष बिखरा हुआ नजर आया।

गौर करने लायक बात है कि भारतीय जनता पार्टी ने जनता के सामने मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया उसमें न तो राजग को न भाजपा को और न ही आर.एस.एस.को कोई दिक्कत थी लेकिन महागठबन्धन में प्रधानमंत्री के नाम को लेकर असमंजस और अन्दरूनी मन मुटाव था था और है। कांग्रेस जहां तेज-तर्रार ममता बनर्जी के रास्ते में रोड़ा बन रही है क्योंकि उसकी नजर में मायावती से बेहतर कोई नहीं है। इस बार का लोकसभा चुनाव देखकर आपको ये नहीं लगता कि चुनाव प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार चुनने के लिए हो रहा है। इसे देखकर ये नहीं कहा जा सकता है कि अगर स्पष्ट बहुमत के साथा भाजपा आई तो यकीनन नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्रा बनेंगे। भले ही 2014 में भाजपा सरकार के मुखिया रहे नरेन्द्र मोदी बहुत सारे वायदे पूरे करने में नाकाम रहे हों लेकिन देश की जनता में अभी भी मोदी के लिए पूरी निष्ठा है।

इस चुनाव में एक और बात देखने में आई कि जिस तह से देश के प्रधानमंत्री का नाम लेकर अपशब्द इस्तेमाल किये गये वो न तो लोकतंत्र के लिए अच्छा है और नही संसद की गरिमा के अनुकूल। संविधान तो इस चुनाव में ताख पर रखा नजर आया है। ंकहा जाता है कि जिसकी जितनी सार्वजनिक मंचों पर बुराई होगी उसको उतनी ही क्ष्याति मिलेगी वो भी बगैर पैसा खर्च किये प्रचार के तौर पर , जिसका मोदी ने जमकर फायदा उठाया है। बहरहाल मतगणना की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है और वक्त की नजाकत बता रही है देश में जो हवा चलनी शुरू हो गई वो मोदी नाम की खुश्बू बिखेर रही है जिसे जनता महसूस कर रही है । वहीं एक मजबूत माने जाने वाला महागठबन्धन अपनी सियासी जमीन को बचा पाने में कामयाब होता नजर नहीं आ रहा है, अगर चुनाव परिणाम गठबन्धन के प्रतिकूल आते हैं तो शायद उन्हें एक चीज का सबक जरूर मिलेगा कि एकता और एकजुटता में अन्तर है। एकता स्वार्थवश होती है और एकजुटता में दृढ़ संकल्प होता है जो गठबन्धन में कहीं भी नजर नहीं आया।

सलीम रज़ा, स्वतंत्र पत्रकार
देहरादून,उत्तराखण्ड

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