सलीम रज़ा
स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था कि ‘जो जाति नारी का सम्मान करना नहीं जानती, वो न तो अतीत में उन्नति कर सकती और न आगे उन्नति कर सकेंगी’। हम सबको इस बात का स्मरण रखना चाहिए कि हम जिनके आदर्शों को आगे रखकर समाज के एक अच्छे इंसान होने का खिताब पाते हैं फिर क्या बात है जब हम अपने अहंकार और सवार्थ के चलते उन आदर्शों के उपदेश को नजर अन्दाज कर जाते हैं? आज हमारे देश में महिलाओं के उत्पीड़न को लेकर आये दिन समाचार प्रकाशित होते रहते हैं, जिन्हें पढ़कर ये लगता है कि क्या पुरूष प्रधान इस देश में आज भी महिलाओं को अपने सम्मान और स्वाभिमान के लिए जंग लड़नी पड़ रही है। क्या हमारे देश का पुरूष भारतीय सनातनी संस्कृति से मुंह मोड़ कर खड़ा है ? जिसमें नारी को देवी का रूप बताया गया है, नारी को पूजने योग्य बताया गया है। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ यानि इसी को ध्यान में रखकर नारी के सम्मान उसके स्वाभिमान के साथ उसे आगे बढ़ाने में अपना सहयोग देना चाहिए। इस को धरातल पर उतारने और समाज के बीच महिलाओं को सम्मान दिलाने के लिए अपनी मानसिकता बदलने के साथ रूढ़िवादी विचारों की तिलांजली देनी पड़ेगी, हमें इससे बाहर निकलकर झांकने की आश्यकता है। विश्व में भारतीय महिलायें ऐसी हैं जो देश की तरक्की में उसे ऊचाईयों तक पहुंचाने के लिए हमेशा अग्रसर रहती हैं। महिलायें अपनी मेहनत लगन और रचनाशीलता से देश में अपनी अलग पहचान बना रही है, महिलाओं के योगदान को देखकर ये लगने लगा है कि अब महिलाये नये भारत की पटकथा लिखने की तरफ अग्रसर हैं।महिलाओं की मेहनत और लगनशीलता का ही परिणाम है कि भारत ऐसे देश में जहां पुरूषों का वर्चस्व है जहां रूढ़ीवादी विचारों की बाढ़ है, वहां महिलायें यकीनी तौर पर एक सुनहरे भारत की तरफ कदम बढ़ा चुकी हैं। फिर भी अभी एक बहुत बड़ा महिलाओं का प्रतिशत है जो घर की चाहरदीवारी के अन्दर बैठकर इन रूढ़ीवादी विचारों के लोगों कोपभाजन बन रही हैं । इसके पीछे वजह ये है कि हमारे देश में पुरूषों की संकीर्ण मानसिकता की संख्या ज्यादा होना, इस मानसिकता के लोग चाहकर भी अपनी मानसिकता में बदलाव नहीं ला सकते वो उसके बन्धनों में जकड़े हुए हैं। इक्कीसवीं सदी के मुहाने पर खड़े़े हुए हम नजर दौड़ायें तो पायेंगे कि आज भी महिला स्वतंत्र नहीं है वो स्वच्छंद विचारों की हो सकती है,लेकिन स्वच्छंद सड़कों पर विचरण नहीं कर सकतीं क्यों? अगर हम महिलाओं से मुत्तालिक आंकड़े देखें तो महिलाओं के उत्पीड़न के मामले हमारे देश में बहुत ज्यादा देखने को मिलते हैं । हमारे देश में महिलाओं के साथ बलात्कार, दहेज हत्या कन्या भू्रण हत्या जैसे लाखों मामले है तों वहीं आज भी देश के अन्दर बाल विवाह जैसी कुप्रथा को रूढ़ीवादी विचारधारा वालों ने दुनिया के मुकाबले 40 फीसद पाल कर जीवित रखा हुआ है। वहीं मुसिलम समाज भी इससे अछूता नहीं है मुस्मि में भी तीन तलाक और हलाला जैसी कुप्रथा ने समाज का रंग बदरंग कर दिया है। तीन तलाक जैसी कुप्रथा के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिबन्ध लगाकर मुस्लिम महिलाओं को पुरूषों की गुलामी से निजात दिलाने का अभूतपूर्व फैसला सुनाया था, जिससे मुस्लिम समाज की महिलाओं को आजादी की सांस लेने के साथ एक नई राह मिली है। सरकार के प्रयासों से और दिनों-दिन बढ़ रही महिलाओं में जागरूकता का ही परिणाम है कि आज हमारे देश में महिलाओं के साक्षर होने में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है , लेकिन ये अभी भी पुरूषों से कम ही है उसका कारण है कि लड़कों की अपेक्षा लड़कियां स्कूल की तरफ रूख कम करती हैं, अगर स्कूल भेज भी दिया जाये तो बीच में ही पढ़ाई छोड़ देती हैं। लेकिन शहरी क्षेत्रों में हालात ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले अच्छे हैं क्योंकि मजबूत राष्ट्र के लिए महिलाओं का शिक्षित होना नितान्त आवश्यक है। अगर बात करे श्रम और कामगार की तो हमारे देश की महिलाओं ने श्रम के क्षेत्र में भी अपनी भागीदारी बनाई है , इसके साथ ही महिलाओं की कुल जनसंख्या का 30 फीसद महिलाये साफटवेयर उद्योग में कर्मचारी हैं। अभी हालिया प्रसिद्ध पत्रिका फोब्र्स में अपना स्थान बनाने वाली दो महिलायें ललिता गुप्ते और किरन मोरपारिया भारत के दूसरे बड़े बैंक आई.सी.आई.सी.आई को संचालित करके देश का गौरव बढ़ा रही हैं। बहरहाल सरकार भी महिलाओं के उत्थान के लिए प्रयासरत् तो है ही लेकिन महिलाओं को आगे लाने और उन्हें हर क्षेत्र में उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चत करने के लिए पुरूषों का योगदान भी बहुत जरूरी है, हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि महिला पैर की चप्पल नही,दिनचर्या का साधन नहीं बल्कि सामाजिक धुरी है लिहाजा हमें अपनी संकीर्ण और कुत्सित मानसिकता के साथ-साथ रूढ़ीवादी परम्पराओं और विचारों को त्याग कर महिलाओं के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही उत्थान और स्वाबलम्बी बनाने की योजनाओं और नीतियों में अपना पूर्ण येगदान दें और उन्हें उसके परिणाम तक पहुचाने में भी अपनी भूमिका सुनिश्चत करें।

सलीम रज़ा की कलम से देहरादून उत्तराखंड

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