पिछले कई सालों से ये देखने को मिला है कि दिल्ली युनिवर्सिटी में प्रवेश परीक्षा का कट आफ 99% है और इस साल तो 100%। यह कट आफ बोर्ड परीक्षा के प्राप्तांक ही हैं। मतलब बोर्ड में 99% या इससे कम पर उच्च शिक्षा के लिये दिल्ली युनिवर्सिटी में प्रवेश नहीं मिलेगा और दूसरी सरकारी या प्राइवेट युनिवर्सिटी की ओर जाना होगा जिसका सीधा असर रोजगार के अवसरों पर घातक होता है।दिल्ली युनिवर्सिटी से हर साल 750 युवा कैम्पस से और 1,32000 युवा 77 संबद्ध कालेजों से उच्च शिक्षा पाते हैं।इनमें से कितनों को रोजगार मिलता है ये किसी से छुपा नहीं। इसी तरह की स्थिति तीन और महानगरों की है।
रोजगार की बदतर स्थिति के साथ उच्च शिक्षा पाने वाले भी सिर्फ 23% युवा ही हैं इंडिया में( यू एस में 86.7%, जर्मनी में 65.5%)।
अब देखते हैं अन्य शहरों की स्थिति जहां महानगरों जैसे रोजगार के कोई अवसर हैं ही नहीं। यहां युवा प्रोफेशनल कोर्सेज में अच्छी खासी धनराशि खर्च करके प्रवेश लेती है फिर सेल्समैनी की नौकरी के सिवाय अन्य सरकारी नौकरियां सिर्फ ख्वाब सी हैं। हर परीक्षा में अभ्यर्थियों की संख्या व परीक्षा केंद्रों , सड़कों व रेलवे स्टेशनों पर लगी भीड़ इस बात को चीख चीख कर बताती हैं।अध्यापकों की सालों से लटकी भर्तियां , शिक्षामित्रों की बदहाली, पुलिस में सिर्फ कांस्टेबलों की भर्ती (उस पर भी मुकदमों से होती देरी) रोजगार के अवसरों की पोल खोलते हैं।
इंजीनियरिंग, डेंटल कालेजों पर लगते ताले शिक्षा के व्यवसायीकरण की खतरनाक दास्तान सुनाते हैं।
सवाल यह है कि क्या इन सब नौकरियों के लिये ही उच्च शिक्षा को इतना प्रसारित किया जा रहा है?
या रिसर्च के लिये?
तो सरकारी डेटा ही बताता है कि इंडिया ने सिर्फ 45000 पेटेंट एप्लीकेशन किये हैं जबकि चीन ने 13 लाख से ज्यादा ।साथ ही इन एप्लीकेशन की क्वालिटी का कोई डेटा नहीं है।
इस नीति में एक नेशनल रिसर्च फाउन्डेशन बनाने की बात की है , जिसे सालाना केवल 20000 करोड़ यानि जीडीपी का मात्र0.1% हिस्सा मिलेगा।क्या ये फाउन्डेशन ही सारी रिसर्च को फंड करेगा? तो ये तो अभी के 0.67%(2014) से भी करीब 7 गुना कम है और 2008 के 0.84% से करीब साढ़े आठ गुना। इससे कौन सी रिसर्च में बढ़ोत्तरी होगी जब एप्लीकेशन ही पास होने में भ्रष्टाचार का बोलबाला हो जायेगा।

अगर उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने का मसला है तो नेशनल हायर एजूकेशन रेगुलेटरी अथारिटी बनाने का निर्णय लिया गया है । यूजीसी की तरह ही इसकेभी भ्रष्ट या एकतरफा और सरकारी दबाव से मुक्त रहने की कल्पना करना बेमानी होगा। ऊपर से यूजीसी बना रहेगा, तो किस तरह से ये रेगुलेशन करेगा, ये सोच पाना नामुमकिन है।
इस गुणवत्ता को किस तरह के कोर्सेज से बढ़ाया जायेगा, ये तय करते करते सरकार के पांच साल तो निकल ही जायेंगे।

साथ ही, उच्च शिक्षण संस्थान , जो अभी संसद के माध्यम से बनते हैं , वे नेशनल हायर एजूकेशन चार्टर से खोले जा सकेंगे।
इससे उच्च शिक्षा का भयानक तेजी से बाजारीकरण होगा और प्राइवेट इंजीनियरिंग व मेडिकल /डेंटल कालेजों की तरह गुणवत्ताविहीन कालेजों की भरमार व फीस उगाही का नया धंधा खुलेगा।

कुल मिलाकर ,उच्च शिक्षा के ये हालात, देश के उन मात्र 25% युवाओं की बदहाली की तस्वीर है, जो किसी तरह उच्च शिक्षा हासिल करने में सक्षम है(बाकी 75% युवाओं के भविष्य की चिंता ही नहीं की गयी है।) इनमें से 90% से ज्यादा शहरी हैं। ग्रामीण इलाकों के 95% से ज्यादा युवा उच्च शिक्षा या प्रोफेशनल कोर्सेज में दाखिला ही नहीं पाते हैं। वे रोजगार या रिसर्च की उम्मीद ही क्या करेंगे? सरकारी डेटा ही कहता है कि कक्षा 9 में प्रवेश लेने वाले युवा मात्र 62% हैं पूरे देश में। इसे शहरी व ग्रामीण अलग करने पर तो तस्वीर भयानक होगी ही।
यही नहीं, कक्षा 8 पास करने वाले सिर्फ 89% ही हैं, इसे भी शहरी और ग्रामीण में तोड़िये तो क्या मिलेगा ये सोचकर रूह कांप सकती है उन लोगों की जो देश को विश्वगुरू व महाभारत काल में इंटरनेट होने की बात पर यकीन करते हैं।

इस स्थिति के सभी युवा कक्षा 10 व 12 की बोर्ड परीक्षा पास करके आये होते हैं। अगर महानगरों और बड़े शहरों के युवाओं का भविष्य अधर में है तो छोटे शहरों के युवाओं की सफलता के भावी प्रतिशत का आंकड़ा बहुत ही कम है। ग्रामीण इंडिया (70% जनसंख्या ) के लिये तो शिक्षा की बात ही बेमानी है।
तो शिक्षा किस तरह की देनी चाहिये , ये सवाल बहुत महत्वपूर्ण है।
कक्षाा 12 व 10 में बोर्ड परीक्षायें कराकर किसी तरह से गुणवत्ता नहीं सुधर रही , जबकि उस उम्र में कांसेप्ट समझना आसान होता है तो नई शिक्षा नीति में प्रस्तावित कक्षा 3 व 5 व 8 में कौन से कांसेप्ट ठीक कर लेंगे, ये बहुत बड़ा सवाल है। कक्षा 3 व 5 में कौन से कांसेप्ट ठीक करने हैं? कि महाभारत कब हुआ , तब इंटरनेट था या नहीं। हां, यदि माइथोलोजी ही रटानी है (सच की तरह) तो हो सकता है ये मंसूबा सफल हो जाये पर विज्ञान व गणित के कांसेप्ट तो कक्षा 3 व 5 के लायक नहीं कि बोर्ड परीक्षा से ठीक किये जा सकें। साथ ही इन परीक्षाओं में फेल होने वाले छात्रों द्वारा पढ़ाई छोड़ने या अवसाद में जाने का डर ज्यादा है( जैसा कक्षा 10 व 12 की परीक्षाओं में बड़ी तादाद में देखा जाता है और कई आत्महत्याओं का हर साल कारण बनता है)। ऐसे में अगर आज कक्षा 9 में प्रवेश लेने वाले मात्र 65% छात्र हैं तो तब कितने बचेंगे? क्या ये शिक्षा की उन्नति होगी या अवनति?

इस नई नीति में कक्षा 9 से 12 की पढ़ाई एक सेंट्रल स्कूल कांप्लेक्स में ही कराने की बात है। मतलब एक बड़े एरिया के अन्य स्कूलों को बंद कर दिया जायेगा। ऐसा केवल ग्रामीण क्षेत्र में होगा या शहरों में भी?
मतलब, एक बड़े एरिया से छात्रों को वहां प्रतिदिन पहुंचना होगा। क्या इसकी व्यवस्था सरकार द्वारा होगी? क्या बच्चों को किसी हास्टल में रखा जायेगा? अगर नहीं , तो बहुत बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल छोड़ देंगे। इतने बच्चों की पढ़ाई व रहने का खर्च सरकार करेगी? सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छिपी नहीं है। ये पूरी शिक्षा प्रणाली के लिये विध्वंसकारी साबित होगा। शायद ऐसा ग्रामीण समाज से दुश्मनी या उनके लिये शिक्षा के रास्ते बंद करने जैसी बात होगी। क्या के कस्तूरी रंगन जी ने सोचा है, ये वे ही बता सकते हैं।
साथ ही, प्राइमरी एजूकेशन के विद्यालयों को एक एजूकेशनल काम्पलेक्स में तब्दील कर देंगे। साथ ही आंगनबाड़ी और प्रौढ़ शिक्षा केंद्र भी। इससे अध्यापकों को ‘शेयर’ करने में आसानी होगी। क्या अध्यापक भी शेयर किये जा सकते हैं ? क्या सारे स्कूल खत्म करके एक स्कूल ही बनाने की योजना है? जब आज शिक्षकों की भयानक कमी व भर्तियों की योजना नहीं दिखायी देती तो शायद ऐसा ही हो। क्या इन स्कूलों को बेसिक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में व्याप्त भ्रष्टाचार से मुक्त कर पायेंगे? क्या शिक्षकों को चुनाव, पल्स पोलियो, जनगणना, कापी किताबें बांटने व बच्चों को स्कूल तक लाने के लिये लोगों से मिलने आदि के काम से मुक्ति दे पायेंगे? क्या ये सब काम आंगनबाड़ी के वर्करों से करायेंगे या नया विभाग खोलेंगे? ऐसा कुछ भी बताया नहीं गया सिर्फ एक कल्पना की उड़ान भरने के सिवाय।

ऐसा लगता है कि सरकार प्राइमरी शिक्षा का बजट काफी कम करना चाहती है पर उसकी शुरूआत अपर प्राइमरी व अपर सेकेन्ड्री पर हमला करके करना चाहती है क्योंकि प्राइमरी पर हमले से जनता व यूनाइटेड नेशन्स दोनों की नाराजगी झेलनी होगी।

निष्कर्ष:
1. ग्रामीण शिक्षा को और भी ध्वस्त करने की रणनीति है नई शिक्षा नीति
2. सिर्फ शहरी प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले 25% बच्चों, जो प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठते हैं, के भविष्य को भी नजरअंदाज करके उन्हें उच्च शिक्षा व रिसर्च में भारी सरकारी दखल व संस्थाओं के मकड़जाल में फंसाने की साजिश सी है ये नई शिक्षा नीति।
3. आंगनबाड़ी, प्रौढ़ शिक्षा को कैसे स्कूल काम्पलेक्स में लाकर शिक्षा का विकास होगा? स्कूल काम्पलेक्स के लिये शिक्षकों की शेयरिंग कैसे होगी? क्या कई प्राइमरी स्कूल खत्म कर देंगे जहां बच्चे कम हैं? इन सवालों का पैदा होना लाजमी है।
4.स्टेट स्कूल रेगूलेटरी अथारिटी, नेशनल हायर एजूकेशन रेगुलेटरी अथारिटी, नेशनल रिसर्च फाउंडेशन जैसी संस्थायें बनाकर शिक्षा का परोक्ष रेगूलेशन सरकारी दबाव में लाने की कोशिश सी लगती है ये नई शिक्षा नीति।
5. शिक्षा के बाजारीकरण को अधिकतम गति देने का प्रयास है।
6. शायद वोकेशनल शिक्षा ही बेरोजगारी से निपटने का साधन समझ रही है सरकार। इनकी गुणवत्ता से बेहतर तो शिक्षा छोड़ काम सीखने को कारखाने में लग जाना बेहतर होगा हमारे इंडिया के नौनिहालों के लिये। स्किल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया का हाल किसी से छुपा नहीं। तो क्या पकोड़ा तलो इंडिया की नीति बनाई है मिस्टर के कस्तूरीरंगन जी न
Dr. Vikas Verma (BDS,MDS) Writer Social Activist

Lucknow.UP

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