कहते हैं कि जितनी बुनियाद मजबूत होगी इमारत उतनी ही मजबूत रहेगी, जिसके अन्दर बैठकर भविष्य सुरक्षित रहता है,ऐसे ही देश के नौनिहाल हैं जिनके बेहतर भविष्य बनाने के लिए बेहतर शिक्षा और पालन पोषण की जरूरत पड़ती है। अगर इनका वर्तमान खराब हो जाये तो फिर बेहतर भविष्य की कल्पना करना बेमानी होगी। इसी कड़ी में मोदी सरकार ने नई शिक्षा नीति को लागू करने का साहस दिखाया है जो बच्चों के बेहतर भविष्य की कल्पना लिये हुये है। दरअसल तकरीबन पांच सालों तक इंतजार की बाट जोहती नई शिक्षा नीति धरातल पर उतर रही है जिसे मानव संसाधन विकास मंत्री उाॅक्टर रमेश पोखरियाल निशंक की देन माना जा रहा है। नई शिक्षा नीति की सबसे बड़ी बात ये है कि इसमें शिक्षा के अधिकार अधिनियम की खामियों को सुधारकर और भी ज्यादा व्यापक बनाने के पीछे सरकार की मंशा साफ नजर आती है। पहले शिक्षा के अधिकार अधिनियम में 6 साल से लेकर 14 साल तक के बच्चों को शामिल किया गया था, लेकिन नई शिक्षा नीति के तहत बच्चों के मानसिक और वौद्धिक विकास की उम्र पूर्व प्राथमिक शिक्षा से जरूरी समझा गया, इसलिए इसमें पूर्व प्राथमिक से लेकर 12 वीं तक अनिवार्य होना चाहिए लिहाजा इसका दायरा पूर्व प्राथमिक से लेकर 12 वीं तक लागू होना चाहिए जो बेहतर कदम माना जा सकता है। कस्तूरी रंगन की सदारत वाली कमेटी ने जो मसौदा नई शिक्षा नीति 2019 संसद के पटल पर रखा है उस मसौदे में बहुत सी ऐसी बाते थीं जो पूर्व की समितियों ने भी दी थी।इसके साथ ही राष्टीªय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 में की गईं थी ,मसलन प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा को तरजीह देना और इसी के साथ-साथ तीन भाषाओं के फार्मूले को भी 2019 की नई शिक्षा नीति में प्रमुखता से शामिल किया गया है। हालांकि इस नई शिक्षा नीति को लेकर भी मोदी सरकार निशाने पर है, हालांकि मोदी जी ने अपनी दूरदर्शिता दिखाते हुये मुखालफती स्वरों के इमकान को बहस का मुद्दा बनने से पहले ही अपने इरादे स्पष्ट करते हुये हिन्दी को लेकर अपने मुखालफीन की सोच को अपने मोडरेट आडटलुक से सभी को खामोश कर दिया था। बहरहाल इन सारी बातों के वावजूद भी नई शिक्षा नीति की राह इतनी आसान नहीं लग रही है जितनी समझी जा रही है, मौजूदा हालात तो ये बता रहे हैं कि ये मुश्किल ही है। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में तेजी के साथ बदल रहे ग्लोबल सिनेरियो के मद्देनजर बदलाव की जरूरत है। पूर्व की शिक्षा नीति थी वो 21 वीं सदी के लिहाज से ठीक नहीं कही जा सकती थी। कस्तूरीरंगन की शिक्षा नीति का ड्राफट दूरदर्शी और मोजूदा शिक्षा प्रणाली की खामियों को दूर करने का साहसिक नजरिया है। मौजूदा शिक्षा नीति में बच्चों को कुछ नया सीखने का कान्सेप्ट माना जा सकता है, जिससे बच्चे की तार्किक क्षमता के साथ-साथ आत्मचिंतन,स्वाबलम्बन और कौशल विकास की प्रेरणा दिखती है। आज के दौर में प्रारम्भिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक के हर क्षेत्र में नित्य नये बदलाव हो रहे हैं जिनमें कुछ ऐसे है जिनके अध्ययन से नैतिक मूल्यों का समावेश तो होता ही है साथ ही व्यवहारिकता के लिए भी एक सिम्बल है। आज के डिजटीलाईजेशन के दौर में किताबों को पढ़ने के लिए प्रेरित करने के साथ पुस्तकालयों पर खुसूसी तवज्जो देने की कोशिश इस शिक्षा नीति में दिखाया गया है जो अच्छा कदम है क्योंकि इस मसौदे में पुस्तकालयों को जीवंत बनाने के साथ बच्चों को पौराणिक कहानियों के साथ रंगमंच, समूह पठन और उनके द्वारा बनये गये चित्रों को डिसप्ले करने पर जोर दिया गया है। नई शिक्षा नीति में एक और बात अच्छी लगी वोये कि बालिकाओं को लेकर है वो ये कि आवासीय विद्यालयों में नवोदय जैसी सुविधा मुहैया करने पर जोर दिया गया है जिसका मकसद बालिकाओं की शिक्षा में कोई गतिरोध न आये उनकी निर्बाध रूप से शिक्षा जारी रहे इसके लिए सुरक्षित वातावरण देने का भी प्रयास किया गया है, तो वहीं कस्तूरबा गाॅंधी वालिका विद्यालय को अपग्रेड कर 12 वीं तक करने का सुझाव भी इस शिक्षा नीति में है। इस नई शिक्षा नीति में रेमेडियल शिक्षण को मुख्य धारा में शामिल करने पर भी जोर दिया गया है इसके तहत 10 साल का परियेजना का प्रस्ताव रखने के साथ महिलाओं और स्वंय सेवकों की भागीदारी सुनिश्चित करने की भी बात कही गई है। लम्बे अवकाश वाले दिनों में भी रेमेडियल कक्षाओं का संचालन किया जाये ऐसे में अनुदेशक स्कूल से पहले और बाद में रेमेडियल शिक्षण का कार्य करेंगे। नई शिक्षा नीति में स्कूल के अध्यापकों को सहयेग देने के मकसद से स्कूलों में लैपटाप,कमप्यूटर के साथ फोन की अनिवार्यता को भी बताया गया है, जिससे अध्यापक नये-नये एप के जरिये शिक्षण को ओर अधिक रोचक बना सके। इसी के साथ कमप्यूटरीकृत और हाईटैक हो रहे जमाने के साथ भागीदारी बनाने का संकल्प भी है। नई शिक्षा नीति में अनावश्यक बोझ और शिक्षा क्रम में बिषय वस्तु का बोझ का सुझव स्वागत योग्य है, क्योंकि इससे लाॅजिकल थिंकिंग को और वृहद किया जा सके। इस मसौदे में मानव संसाधन मंत्रालय की 1993 में यशपाल और 2005 की एन.सी.एफ की सलाह का भी जिक्र किया गया है, जिसमें बस्ते के बोझ और स्लेबस को आसान और सुगम बनाने का मश्विरा था। अन्तत्वगोत्वा सार ये है कि इस नई शिक्षा नीति 2019 में प्राथमिक स्तर पर शिक्षा में बहुभाषिकता को शामिल करने की तरजीह दी गई है। साथ ही ऐसे शिक्षकों को महत्व देने पर भी जोर दिया गया है जिसमें अध्यापक बच्चों के घर की भाषा समझते हों तकरीबन ये समस्या देश के ज्यादातर राज्यों में देखने को मिलती है। अगर हम इसके मूल विचारों की बात करें तो जो मसौदा कस्तूरीरंगन की इस नई शिक्षा नीति में दर्शाया गया है वो बच्चों के सीखने और स्किल डेवलपमेंट पर फोकस करती है, जिससे बच्चा अपने आसपास घटने वाली घटनाओं से हर पल नया सीखने की कुव्वत रख सके। उच्च शिक्षा में गुणवतता लाने के लिए रिसर्च को तरजीह देने के मकसद से राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान बनाये जाने जैसे अनेकों उपाय लागू करने का भी इसमें जिक्र और प्रावधान है जिससे हमारे विश्वविद्यालय अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कम्पटीशन कर सकें। शिक्षण संस्थानों को स्वायत्ता दने के साथ उनकी जिममेदारियों के मानदण्ड भी तय करना जैसा सुझाव इस नीति में है। बहरहाल जिस तरह से कस्तूरीरंगन समिति ने नई शिक्षा नीति 2019 का मसौदा तैयार किया है, अगर सचमुच इन बदलावों के साथ नई शिक्षा नीति को अमलीजामा पहनाकर धरातल पर उतारा जाता है तो यकीनन ये मोदी सरकार का एक क्रान्तकारी कदम साबित होगा। और नई शिक्षा नीति लागू हो जाने के बाद हिन्दुस्तान के सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ते कदम किसी माईल स्टोन से कम नहीं होगा इसमें कोई शक नहीं है।

सलीम रज़ा(लेखक)
देहरादून उत्तराखंड

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