युवा देश के कर्णधार हैं ये बात सुनते थे ओर सुनते चले आ रहे हैं वैसे भी जिस देश के युवा चिन्तनशील होंगे वो देश बहुत तेजी के साथ तरक्की की पायदान चढ़ता चला जाता है लेकिन अगर जिस देश का युवा गुमराही के रास्ते पर चल पड़ेगा तो उस देश की तरक्की असंभव है। दरअसल आज के दौर की युवा पीढ़ी जिस रास्ते पर निकल पड़ी है वो देश की प्रगति और तरक्की के लिए एक अभिशाप है वो राह हैे युवाओं में तेज़ी के साथ बढ़ती नशे की आदत आज ज़्यादातर युवा इस आदत का शिकार हो रहा है। पुलिस की लाख कोशिशों के बाद भी नशे के कारोबारी फल फूल रहे हैं नशे के कारोबारियों का निशाना स्कूलों के इर्द गिर्द होता है। उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून में नशे का प्रचलन युवाओं में कुछ ज़्यादा ही है इन युवाओं के पास नशे के प्रकार भी कई तरह के हैं जिनका रसस्वादन करके ये युवा मदमस्त होकर शहर की सड़कों पर शाम ढ़लते ही विचरण करते है। उनकी ये शाम और भी परवान चढ़ती है जब इनके हाथों में बाईकें हों तो फिर ये खतरों के खिलाड़ी से कम नहीं दिखते। आइये इन खतरों के खिलाड़ियों का प्रोफाईल बता दें ये राजधानी के अमीर जादे हैं जिनकी मि़त्र मंडली को पूरा करते हैं दूर दराज़ शहरों से आये वे उच्च और मध्यमवर्गीय युवा जिनके माता पिता ने अपने सुनहरे सपने दिन में देखकर अपने श्रवण कुमारों कों बड़ी उम्मीद के साथ शिक्षा नगरी देहरादून भेजा कि ये श्रवण कुमार अपना भविष्य सवांरकर बुढ़ापे में उनका सहारा बनेंगे। लेकिन उन बेचारों को क्या मालूम कि उनका जिगर का टुकड़ा किसी हुक्केबार में बैठकर अपने भविष्य और अपने मां बाप के सपनों को धंुयें के छल्लों में आसमानी कुलांचे दे रहा है। इनके शौक को परवान चढ़ाती हैं इनकी सहपाठिकायें जो स्कूल टाईम से लेकर देर शाम तक इनका साथ निभाती हैं,ऐसा नहीं कि वो इन बातों से अछूती हैं बाकायदा वो भी हुक्के बार, बीयर बारों में देखी जा सकती हैं जो इनका भरपूर साथ देती हैं देखने वाली बात ये है कि इन शौकों के साथ उनकी सहभागिताओं, नाज़नीनों के भी खर्चे हैं जो आशाओं से कहीं ज्यादा होते हैं जिनको पूरा करने के लिए वे वचनवद्ध होते हैं। लिहाजा घर से मिलने वाली पॅाकेट मनी इनके लिए पर्याप्त पहीं हो सकती इसलिए ये लोग उन खर्चों को पूरा करने के लिए वो रास्ते अपना लेते हैं जिसे समाज और कानून अपराध और अपराधी की संज्ञा देते हैं। गौर करने वाली बात है कि ज्यादातर ऐसे मामले सामने आये हैं जिनमें स्कूल कॅालेजों में पढ़ने वाले ज्यादातर युवा होते है। इस नशे के शौकीनों की श्रेणी भी है जिसमें अति मध्यम के साथ झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले वो युवा भी हैं जो या तो शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं या फिर दिहाड़ी़ पर काम करते हैं इन लोगों की पहली पसन्द मंहगे से मंहगा सेल फोन होता है जो हर समय कान पर लगा देखा जा सकता है इनके फोन में न तो कभी बैलेन्स खत्म होता है और न ही नेट । इनकी महत्वाकांछाए उन अमीर ज़ादों के शौक और एक अदद साथी पाने की चाहत में मचलती हैं लिहाजा ये भी उनकी परिपाटी पर चलकर उनका अनुसरण करते हैं अन्तर ये है कि उनके मुकाबले इनके साधन बेहद सीमित होते हैं जिन्हे पूरा करने के लिये ये निम्न स्तर के गंदे कामों पर उतर जाते है,ं जैसे सट्टा, जुआ, चोरी जैसे कामों पर उतर आते हैं ये लोग इतने शातिराना रवैया रखते है कि हाल फिलहाल इन पर कोई शक नहीं कर पाता इस लिये ये उन घरों की रेकी करते है जिनके दिनचर्या के बारे मेंये अच्छी तरह से जानते है और उचित मौका पाकर अपने काम को अंजाम दे जाते हैं उसके बाद तो इनकी बल्ले-बल्ले रहती है बाकायदा ये भी अपनी साथी के साथ मॅाल या अच्छे होटलों में देखे जा सकते हैं। लेकिन यहीं तक बात नहीं थमती इस तरह के वो लोग जो अपने शहर में इन कामों के जरिये पुलिस गिरफ्त में आ जाते हैं वो भी अपनी शरण स्थली देहरादून के झुग्गी झोपड़ी वाले इलाकों में बना लेते हैं और छोटे मोटे काम में लगे रहते हैं उसके बाद ये भी बड़ी बारदात को अंजाम देकर अपने शहर जाकर गुलछररे उड़ाते हैं और सब कुछ नार्मल होने के बाद वापस देहरादून का रूख कर जाते हैं। आईये अब इन सारी बातों की जड़ नशे की बात करें तो ये नशा इन झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले लोगों के साथ साथ परचुन की छोटी दुकाने और ड्रग्स के लिये गली मोहललों के छोटे मेडिकल स्टोर हैं जहां इन बिगड़ेलों को आसानी के साथ नशा मुहैय्या हो जाता है ये लोग भी इनके शौक का भरपूर फायदा उठाते हैं और इनके दामों से कई गुना इजाफा करते हैं। पुलिस की निगाह में भी सब कुछ है लेकिन उनके लिए पेश किया गया सुविधा शुल्क ही इन नशे के कारोबारियों में जान फूंक देती है और इनका कारोबार पुलिस की नज़रअन्दाजी से खूब फल फूल रहा है जिसके चलते युवाओं का भविष्य अंधकार की तरफ चल रहा है और देहरादून जैसे शान्तप्रिय शहर की छवि धूमिल हो रही है।नशे की जद में दून के युवा
सलीम रज़ा

युवा देश के कर्णधार हैं ये बात सुनते थे ओर सुनते चले आ रहे हैं वैसे भी जिस देश के युवा चिन्तनशील होंगे वो देश बहुत तेजी के साथ तरक्की की पायदान चढ़ता चला जाता है लेकिन अगर जिस देश का युवा गुमराही के रास्ते पर चल पड़ेगा तो उस देश की तरक्की असंभव है। दरअसल आज के दौर की युवा पीढ़ी जिस रास्ते पर निकल पड़ी है वो देश की प्रगति और तरक्की के लिए एक अभिशाप है वो राह हैे युवाओं में तेज़ी के साथ बढ़ती नशे की आदत आज ज़्यादातर युवा इस आदत का शिकार हो रहा है। पुलिस की लाख कोशिशों के बाद भी नशे के कारोबारी फल फूल रहे हैं नशे के कारोबारियों का निशाना स्कूलों के इर्द गिर्द होता है। उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून में नशे का प्रचलन युवाओं में कुछ ज़्यादा ही है इन युवाओं के पास नशे के प्रकार भी कई तरह के हैं जिनका रसस्वादन करके ये युवा मदमस्त होकर शहर की सड़कों पर शाम ढ़लते ही विचरण करते है। उनकी ये शाम और भी परवान चढ़ती है जब इनके हाथों में बाईकें हों तो फिर ये खतरों के खिलाड़ी से कम नहीं दिखते। आइये इन खतरों के खिलाड़ियों का प्रोफाईल बता दें ये राजधानी के अमीर जादे हैं जिनकी मि़त्र मंडली को पूरा करते हैं दूर दराज़ शहरों से आये वे उच्च और मध्यमवर्गीय युवा जिनके माता पिता ने अपने सुनहरे सपने दिन में देखकर अपने श्रवण कुमारों कों बड़ी उम्मीद के साथ शिक्षा नगरी देहरादून भेजा कि ये श्रवण कुमार अपना भविष्य सवांरकर बुढ़ापे में उनका सहारा बनेंगे। लेकिन उन बेचारों को क्या मालूम कि उनका जिगर का टुकड़ा किसी हुक्केबार में बैठकर अपने भविष्य और अपने मां बाप के सपनों को धंुयें के छल्लों में आसमानी कुलांचे दे रहा है। इनके शौक को परवान चढ़ाती हैं इनकी सहपाठिकायें जो स्कूल टाईम से लेकर देर शाम तक इनका साथ निभाती हैं,ऐसा नहीं कि वो इन बातों से अछूती हैं बाकायदा वो भी हुक्के बार, बीयर बारों में देखी जा सकती हैं जो इनका भरपूर साथ देती हैं देखने वाली बात ये है कि इन शौकों के साथ उनकी सहभागिताओं, नाज़नीनों के भी खर्चे हैं जो आशाओं से कहीं ज्यादा होते हैं जिनको पूरा करने के लिए वे वचनवद्ध होते हैं। लिहाजा घर से मिलने वाली पॅाकेट मनी इनके लिए पर्याप्त पहीं हो सकती इसलिए ये लोग उन खर्चों को पूरा करने के लिए वो रास्ते अपना लेते हैं जिसे समाज और कानून अपराध और अपराधी की संज्ञा देते हैं। गौर करने वाली बात है कि ज्यादातर ऐसे मामले सामने आये हैं जिनमें स्कूल कॅालेजों में पढ़ने वाले ज्यादातर युवा होते है। इस नशे के शौकीनों की श्रेणी भी है जिसमें अति मध्यम के साथ झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले वो युवा भी हैं जो या तो शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं या फिर दिहाड़ी़ पर काम करते हैं इन लोगों की पहली पसन्द मंहगे से मंहगा सेल फोन होता है जो हर समय कान पर लगा देखा जा सकता है इनके फोन में न तो कभी बैलेन्स खत्म होता है और न ही नेट । इनकी महत्वाकांछाए उन अमीर ज़ादों के शौक और एक अदद साथी पाने की चाहत में मचलती हैं लिहाजा ये भी उनकी परिपाटी पर चलकर उनका अनुसरण करते हैं अन्तर ये है कि उनके मुकाबले इनके साधन बेहद सीमित होते हैं जिन्हे पूरा करने के लिये ये निम्न स्तर के गंदे कामों पर उतर जाते है,ं जैसे सट्टा, जुआ, चोरी जैसे कामों पर उतर आते हैं ये लोग इतने शातिराना रवैया रखते है कि हाल फिलहाल इन पर कोई शक नहीं कर पाता इस लिये ये उन घरों की रेकी करते है जिनके दिनचर्या के बारे मेंये अच्छी तरह से जानते है और उचित मौका पाकर अपने काम को अंजाम दे जाते हैं उसके बाद तो इनकी बल्ले-बल्ले रहती है बाकायदा ये भी अपनी साथी के साथ मॅाल या अच्छे होटलों में देखे जा सकते हैं। लेकिन यहीं तक बात नहीं थमती इस तरह के वो लोग जो अपने शहर में इन कामों के जरिये पुलिस गिरफ्त में आ जाते हैं वो भी अपनी शरण स्थली देहरादून के झुग्गी झोपड़ी वाले इलाकों में बना लेते हैं और छोटे मोटे काम में लगे रहते हैं उसके बाद ये भी बड़ी बारदात को अंजाम देकर अपने शहर जाकर गुलछररे उड़ाते हैं और सब कुछ नार्मल होने के बाद वापस देहरादून का रूख कर जाते हैं। आईये अब इन सारी बातों की जड़ नशे की बात करें तो ये नशा इन झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले लोगों के साथ साथ परचुन की छोटी दुकाने और ड्रग्स के लिये गली मोहललों के छोटे मेडिकल स्टोर हैं जहां इन बिगड़ेलों को आसानी के साथ नशा मुहैय्या हो जाता है ये लोग भी इनके शौक का भरपूर फायदा उठाते हैं और इनके दामों से कई गुना इजाफा करते हैं। पुलिस की निगाह में भी सब कुछ है लेकिन उनके लिए पेश किया गया सुविधा शुल्क ही इन नशे के कारोबारियों में जान फूंक देती है और इनका कारोबार पुलिस की नज़रअन्दाजी से खूब फल फूल रहा है जिसके चलते युवाओं का भविष्य अंधकार की तरफ चल रहा है और देहरादून जैसे शान्तप्रिय शहर की छवि धूमिल हो रही है।

सलीम रज़ा की कलम से

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