सरकारी दावे और नेताओं के भाषण देश की जनता को इस कदर भ्रमित कर देते हैं कि उसे सच्चाई का पता ही नहीं चलता है। मान लिया जाये अगर उसे सच्चाई का पता चल भी गया तो कर क्या लेगा, क्योंकि लोकतंत्र की गर्दन तो इन्हीं नेताओं के मजबूत हाथों के बीच फंसी है बस छटपटाते रहो। देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है जो अपना एक कार्यकाल पूरा करके दूसरा कार्यकाल और भी ज्यादा मजबूत होकर संभाल चुकी है। पूरा देश इस वक्त भगवामय हो गया है, सही मायने में देश राम राज्य की तरफ बढ़ रहा है, लेकिन राम राज्य में भुखमरी,कुपोषण, वेन्टीलेटर पर खुद चिकित्सा व्यवस्था,पीने के पानी के लिए भटकते लोग,सड़कों पर महिलाओं की आबरू खतरे में ये कैसा राम राज्य?। खैर ये तस्वीर सिर्फ दिखाने की है वरना असल में तो बहुत ही भयावह तस्वीर है जिसे सुनकर आघात जरूर पहुंचेगा। आपको मालूम है कि हमारा देश दिनो दिन सुधर रही अर्थव्यवस्था के सोपान तेजी के साथ चढ़ रहा है, है न खुशी की बात लेकिन दुख और मानवता को शर्मसार करने वाली तस्वीरों के बीच देश के सारकारी सिस्टम और आंकड़ों की बाजीगरी खेलते सत्ता में बैठे नेताओं के जमीर को नोचती जरूर होगी, लेकिन सत्ता की चाहत इन मौत के आंकड़ों से कहीं ज्यादा है। ये एक शर्मनाक सच है कि जब हमारे नीति नियंता हिन्दुस्तान को विश्व गुरू बनने का सपना दिखा रहे है,ं वहीं हमारा देश ग्लोबल हंगरी इन्डेक्स में 103 नम्बर पर है।

आपको बता दें कि अन्तरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान द्वारा हर साल अक्टूबर में आंकड़े जारी किये जाते हैं इस लिहाज से पिछले साल 2018 में हिन्दुस्तान भुखमरी और कुपोषण के मामले में 103 नम्बर पर पहुंच गया है। ये कितना दुखदायी और हैरान कर देने वाला है कि हमारे देश में भूख जैसी सेक्युलर समस्या को आखिर तवज्जो क्यों नही मिल रही है? क्यों सब चुप्पी साधे हैं। दरअसल इसके लिए वो लोग जिम्मेदार है जो सेक्युलर वादी विचार धारा के तो है लेकिन उंची जातियों के कब्जे में हैं। शायद इस बात पर सहमत हों न हों लेकिन सौ फीसद सच है कि भूख से लड़ते-लड़ते दम तोड़ने वालों में गरीब और दलित ही हैं। कितना अफसोसजनक है कि जहां हिन्दू उंची जातियों के मुकाबले दलित बच्चे 53 फीसद कम वजन के होते हैं और आदिवासी बच्चे 69 फीसद फिर भी ये बात कहने के लिए हिम्मत नहीं है कि हिन्दुस्तान में भूख जैसे संवेदनशील विषय पर गहन चर्चा की जरूरत है। लेकिन सच्चाई तो ये है कि देश में भूख हो या फिर कुपोषण ये हमारी भारतीय सियासत के लिए कोई मायने नहीं रखते शायद ये वो विषय है जिसको संसद के किसी भी सत्र में किसी भी सांसद द्वारा चर्चा के लिए लाया गया हो, या फिर सियासत के ठेकेदारों ने इसे प्रमुखता से अपने भाषणों में ही उठाया हो। क्या ये हैरानी की बात नहीं है कि भारत ऐसे विकासशील देश में बच्चों की मृत्यु दर सबसे ज्यादा है।

फिलहाल हिन्दुस्तान में इस समस्या पर कोई भी स्वभाविक बदलाव के आसार तो मौजूदा समय में नजर नहीं आ रहे हैं क्योंकि उसका कारण हैं हिन्दुस्तान में मौसम के अनसट्रेन मिजाज के चलते कृषि विकास और अनाज उत्पादन का फीसद दिनो ंदिन कम हो रहा है । ये कहना जायज होगा कि हिन्दुस्तान में फिलहाल कृषि अर्थव्यवस्था न के बराबर है, लेकिन हिन्दुस्तान के अन्दर गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाला ग्रामीण क्षेत्र का बड़ा हिस्सा खेती पर ही निर्भर है। भूख एक बेहद ही गम्भीर समस्या है और हमारा देश कृषि प्रधान देश कहलाता है यहां तक की राज्य सरकारें भी रिकार्ड कृषि उत्पादन का दम भरती हैं शायद अटपटा लगे लेकिन सच भी है कि हमारी मोदी सरकार गरीबों की सरकार होने का प्रचार करती है कि गरीबों को सस्ते मूल्य पर अनाज उपलब्ध करा रही है फिर क्यों ग्लोबन हंगर इन्डेक्स में साल दर साल भारत भुखमरी और कुपोषण के आंकड़े बढ़ा रहा है। इस पर कभी गौर फरमाया कि हर साल देश के अन्दर अमीर और अमीर हो रहे हैं जबकि गरीब और गरीब होता जा रहा है ये सच है लेकिन चैंकाने वाला सच। जब 2014 में मोदी सरकार आई तब हिन्दुस्तान ग्लोबल हंगरी इन्डेक्स में 55वें स्थान पर था लेकिन अक्टूबर 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक 103 नम्बर पर पहुच गया अब आप खुद अन्दाजा लगा लें कि मोदी सरकार गरीबों की सरकार है या पूजीपतियों कि ये रिपोर्ट मोदी सरकार की जबावदेही तय करती है । सरकार के मुखिया देश को बतायें कि हिन्दुस्तान में भूख और कुपोषण की वजह क्या है। ये तो हम आप सभी जानते हैं कि संसद के अन्दर और बाहर मंचों पर मोदी के भाषणों पर कितनी तालियां फटकारी जाती हो,ं लेकिन भूख भाषणों से नहीं मिटती ये बात ध्यान रखनी चाहिए।

हिन्दुस्तान को तरक्की का आईना दिखाने वाली मोदी सरकार भूख के मोर्चे पर नाकाम साबित हुई है। बहरहाल भूख से मरने वालों का सिलसिला थमा नहीं है कुछ ऐसे मामले भी सामने आये जिसे सुनकर दिल कांप जाता है। खुद देख लें 329 करोड़ अबादी वाले झारखण्ड में तो हालात बहुत ही बदतर है , जहां 263 करोड़ लोग सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर आश्रित हैं वहां पर वायोमैट्रिक आईडेन्टिटी की अनिवार्यता के चलते चावल न मिल पाने से एक ग्यारह साल की बच्ची ने भात-भात कहते हुये भूख से दम तोड़ दिया, लेकिन सरकार अपनी नाकामी को दबाती ही रही। कितना दुखदायी है कि ऐसी अकाल मौतों से थोड़े समय के लिए केन्द्र और राज्य सरकारें दबाव में तो होती हंै, लेकिन बड़ी चतुराई के साथ इस पर काबू पा जाती हैं। उसका कारण ये हैं कि सरकार और सरकारी सिस्टम दोनों ही अपनी आंखों पर पट्टी बांधे हुये है,ं क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने साफ तौर पर कहा था कि राशन कार्ड को आधार कार्ड से लिंक न होने पर भी राशन दिया जाये लेकिन सरकारें ये ही दलील देती रही हैं कि बायोमैट्रिक आईडेन्टिफिकेशन की अनिवार्यता के बावजूद कोई भी राशन से वंचित नहीं होगा। लेकिन जिस तरह के हादसे हुये हैं उससे जमीनी सच्चाई सामने है, जहां उच्चतम न्यायालय के निर्देश और सरकारी दावे बेमेल हैं। बहरहाल हिन्दुस्तान में भूख से बिलखते तड़पते भूख से मरने वालों का सिलसिला इंसानियत को शर्मसार करता है।

ग्लोबल महाशक्ति की ओर बढ रहे हिन्दुस्तान की दशा भुखमरी के मामले में बंगला देश से भी बुरी है। हां हम इस बात पर अपना सीना जरूर तानकर कह सकते हैं कि हम अपने दुश्मन पड़ोसी देश पाकिस्तान से तो बेहतर ही हैं। बहरहाल भले ही हमारी सरकार अपने आप को औरों के मुकाबले बेहतर साबित करने में लगी हो, लेकिन शर्म का विषय है कि जिस देश में चुनाव पर अरबों-खरबों रूपये लुटाया जाता रहा हों और उसी देश का भविष्य भूख से कराहकर मां की गोद में दम तोड़ दे और संसद में बैठे हमारे नीति नियंता जनता को सुनाने के लिए झूठ की स्क्रिप्ट लिखने में मशगूल हों इससे ज्यादा इंसानियत को तार-तार कर देने वाला मंजर और क्या होगा।

सलीम रज़ा लेखक

देहरादून उत्तराखंड

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