अभी हाल में संपन्न हुये लोकसभा चुनाव में महागठबन्धन की लाखों कोशिशों के बाद भी केन्द्र में भाजपा की सरकार बनी वो भी पहले से कहीं ज्यादा प्रचंड बहुमत के साथ। हालांकि चुनाव में छिट-पुट घटनाओं का होना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन जिस तरह से पश्चिम बंगाल में हिंसा के दम पर चुनाव के सभी चरण समाप्त हुये वो सच में अफसोस जनक और लोकतंत्र के माथे पर बदनुमा दाग जैसे हैं। इसे ममता की हताशा कहें या फिर गुलाम बनाये हुये लोकतंत्र की दासतां, जहां मतदाता को आजादी नहीं वल्कि गुलामी की जंजीरों में जकड़ कर ममता बनर्जी ने रखा था। टी.एम.सी बनाम भाजपा की लड़ाई में अपना वर्चस्व दिखाने के लिए ममता बनर्जी की शह पर टी.एम.सी. कार्यकर्ताओं ने भाजपा के कार्यकर्ताओं को अपना निशाना बनाया हुआ था इस पूरे चुनाव में कई भाजपा कार्यकर्ता अपनी जान गंवा बैठे थे लेकिन ममता बनर्जी का अहंकार सिर चढ़कर बोलता ही रहा। इस जंग की सबसे बड़ी बात थी ममता बनर्जी की विरासत बन चुकी सियासत और गुलाम बने लोकतंत्र की आजादी जिसमें भाजपा ने सेंधमारी करने की कोशिश जो शायद ममता बनर्जी को नागवार गुजरी, इसी खिसियाहट का नतीजा था कि साोनार वांग्ला चुनाव में रंक्त रंजित् हो गया।

ये बात किसी से छिपी नहीं थी कि पश्चिम वंगाल में लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं है उसे तो ममता बनर्जी ने गुलाम बनाकर रख दिया था। भारतीय जनता पार्टी इस बात को लेकर हमेशा मुखर रही है कि वंगाल में कानून और संविधान की मर्यादा तार-तार हो चुकी है, और वंगाल की जनता ममता सरकार की तानाशाही से तंग आकर परिवर्तन लाने का मन बना चुकी है। ये बातें तब थीं जब चुनाव का वक्त भी नहीं था लेकिन भारतीय जनता पार्टी वंगाल की जनता की नब्ज टटोलने में 2014 के बाद से ही लगी हुई थी जब उसे लगने लगा कि बंगाल में भाजपा की सीटों के अकाल को खत्म करने का सही वक्त आ चुका है उसी को ध्यान में रखकर भाजपा ने चुनाव की घोषणा होने के बाद अपना सारा फोकस बंगाल पर कर दिया। भाजपा को लगने लगा कि ममता के शासन से तंग जनता को अगर वो अपने पक्ष में कर लें तो कुछ न कुछ सीटें भाजपा हथियाने में कामयाब हो जायेगी जो उसे बोनस सीटों के रूप में हासिल होंगी। लिहाजा 2019 के चुनाव में जब भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल में ताबड़-तोड़ रैलियां की तो ममता बनर्जी के सब्र का बांध टूट गया इसी का नतीज़ा था कि बौखलाहट में ममता के कार्यकर्ताओं ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की रोड शो में जमकर हिंसा करी लेकिन शायद इसका नकारात्मक संदेश ममता के पक्ष में गया और इसका फायदा भारतीय जनता पार्टी को 18 सीटें जीत कर मिला।

हालांकि चुनाव परिणाम घोषित हुये एक माह हो चुका है लेकिन बंगाल के हालातों में कोई भी सुधार नहीं हुआ है। अब चूंकि गृह मंत्रालय खुद अमित शाह के पास है लिहाजा वे इस बात पर मंथन अवश्य कर रहे होंगे कि बंगाल में उपजे जंगलराज पर कैसे लगाम लगाई जायें, क्योंकि केन्द्रिय गृह मंत्री होने की वजह से अमित शाह की जिम्मेदारी भी बनती है कि वो राज्यों की बिगड़ती कानून व्यवस्था पर सख्त फैसला लें। अभी भी बंगाल में भाजपा कार्यकर्ता खौफ के साये में हैं जिसपर भाजपा सरकार में मंथन अवश्य चल रहा होगा और इस मंथन का रास्ता एक ही तरफ जाकर खत्म होता है और वो है अनुच्छेद- 356 जिसमें प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाकर दोबारा चुनाव कराये जाये। ं क्योंकि केन्द्रिय गृह मंत्रालय की तरफ से ममता सरकार को जारी की गई एडवाइजरी इसी बात का संकेत है कि प्रदेश की कानून व्यवस्था नियंत्रण से बाहर है और ममता सरकार प्रदेश के नागरिकों का विश्वास जीतने में नाकाम रही है। हालांकि प्रदेश के राज्यपाल ने प्रधानमंत्री से मुलाकात करी थी वहीं ममता बनर्जी ने एडवाइजरी का जवाब भी दिया है कि प्रदेश में हालात नियंत्रण मे हैं जबकि सच तो ये है कि बंगाल में अभी भी हालात सामान्य नहीं हैं।

अब सवाल ये उठता है कि क्या मोदी सरकार बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने का सख्त कदम उठायेगी। हालात तो ये बता रहे हैं कि बंगालं में एक तरफ टी.एम.सी और भाजपा कार्यकर्ता आमने सामने हैं तो वहीं केन्द्र और प्रदेश की सरकार भी आमने सामने खड़ी हो गई हैं बहरहाल बंगाल के राज्यपाल का प्रघानमंत्री और गृहमंत्री से मुलकात के तो ये ही मायने निकाले जा रहे हैं कि जल्द ही बंगाल में राष्ट्रपति शासन लग सकता है। यहां एक सवाल ये भी खड़ा होता है कि बंगाल में 2021 में चुनाव होने ही हैं और अगर भाजपा राष्ट्रपति शासन लगाती है तो हो सकता है कि उप चुनाव में इसका फायदा ममता बनर्जी को सहानभूति के तौर पर मिल जाये, ऐसे हालात में भाजपा भी नहीं चाहेगी कि जल्दबाजी में कोई कदम उठाया जाये। हाल ये है कि भाजपा को असमंजस के दौर से गुजरना पड़ रहा है। बंगाल में पहले हुये पंचायत चुनाव और फिर लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत और उसके बढ़ते जनाधार को देखते हुये तो कम से कम भाजपा ऐसे कदम उठाने से परहेज ही करेगी। कहते हैं कि दूध का जला छाछ फूंक-फूंक कर पीता है वो इसलिए कि भाजपा को ऐसे निर्णय लेने का कड़वा अनुभव भी है क्योंकि भाजपा ने अरूणांचल और फिर उत्तराखण्ड में अनुच्छेद- 356 का इस्तेमाल किया था और दोनो ही बार उसे न्यायपालिका के हस्तक्षेप से मुह की खानी पड़ी थी।

लिहाजा बंगाल के मामले में भाजपा एहतियात के साथ पूरी तरह से संवैधानिक और कानूनी तौर पर सावधानी के साथ कदम उठायेगी। खैर बंगाल के हालात को देखते हुये मोदी सरकार जो भी कदम उठाये या आने वाले चुनाव तक का इंतजार करे ये तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन एक बात स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में ममता का सियासी सूरज अस्त की तरफ तेजी से बढ़ रहा है।

सलीम रज़ा

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