जिस तरह बार-बार बिजली गुल हो रही है उससे जनाक्रोश का अंकुरण होना स्वाभाविक है। बिजली आपूर्ति की अनियमितता ने छत्तीसगढ़ सरकार की यूं ही किरकिरी कर रखी थी, तिस पर अब बिजली कटौती पर एक वीडियो जारी करने वाले राजनांदगांव जिले के मुसरा (डोंगरगढ़) निवासी मांगेलाल अग्रवाल और अपने न्यूज पोर्टल ‘वेब मोर्चा’ में 48 घंटे 50 गांवों में बिजली आपूर्ति अवरुध्द रहने की खबर जारी करने वाले पोर्टल संचालक पत्रकार दिलीप शर्मा की गिरफ्तारी ने प्रदेश सरकार और उसके नौकरशाहों की कार्यप्रणाली को सवालों के दायरे में खड़ा कर दिया है।
कांग्रेस के नेता इसे भाजपा की राजनीतिक चाल बता रहे हैं। उनका कहना है कि बिजली मेंटेनेंस को पॉवरकट बताकर भाजपा भ्रम फैला रही है। समझ से परे है कि यह लगभग छह माह से कौन-सा मेंटेनेंस चल रहा है? क्या इससे पहले प्रदेश के लोगों ने बिजली विभाग का मेंटेनेंस कार्य नहीं देखा है? और अगर भाजपा भ्रम फैला रही है तो कांग्रेस और उसकी सरकार को क्या बिजली आपूर्ति की व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए किसी ने रोका है? ‘बिजली बिल हाफ’ का वादा पूरे प्रदेश में ‘बिजली हाफ‘ का जुमला बनकर रह गया है! क्या यह सरकार की विफलता नहीं है? क्या ऐसी स्थिति में सरकार के कामकाज के तौर-तरीकों पर सवाल नहीं उठेंगे? और क्या सवालों के समाधान के बजाय अब एक लोकतांत्रिक देश की प्रदेश सरकार राजद्रोह जैसे मामले बनाकर अपने प्रति गहराते असंतोष को दबाती हुई शोभा दे रही है? अपने द्वारा चुनी गई सरकार के कामकाज पर सवाल उठाना या टिप्पणी करना (बशर्ते वह अमर्यादित न हो) राजद्रोह या उकसाने जैसा कृत्य कैसे माना जा सकता है?
फिर एक अहम सवाल और भी है। मांगेलाल अग्रवाल और दिलीप शर्मा की गिरफ्तारी और उन पर राजद्रोह और सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार करने जैसा गंभीर आरोप लगाकर सरकार ने क्या अभिव्यक्ति की आजादी को खतरे में डालने का काम नहीं किया है? दिलीप शर्मा को तो आधी रात के करीब घर से गिरफ्तार करके ले जाया गया! अभिव्यक्ति की आजादी के तथाकथित पैरोकारों, डिजाइनर बुध्दिजीवियों की जमात को क्या यह मामला असहिष्णुता और भयभीत करने वाला प्रतीत नहीं हो रहा है? सवाल यह भी है कि आखिर छत्तीसगढ़ सरकार इतनी विचलित क्यों है? अपने काम की आलोचना उसे बर्दाश्त क्यों नहीं हो रही है? क्या पांच महीने में अपने जनसमर्थन को छीजता देखकर सरकार अब इस तरह का आचरण कर रही है? यह तो स्थापित सत्य है कि सत्ता अपनी आलोचना पसंद नहीं करती, पर एक लोकतांत्रिक सरकार को धैर्य व संयम के धरातल पर खड़े होकर जन असंतोष का समाधान करना चाहिए, क्योंकि आतंक और अभिव्यक्ति पर रोक लगाने वाली किसी भी लोकतांत्रिक सरकार को वेन्टिलेटर पर जाने में ज्यादा देर नहीं लगती।
✍ अनिल पुरोहित. स्वतंत्र पत्रकार छत्तीसगढ़

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