आज के दौर में घर से लेकर बाहर तक बातचीत के मायने और उसके तौर तरीकों में बेहिसाब बदलाव आया है। पहले सीधी और सपाट बात कहने वाला व्यक्ति सबकी आंख का तारा होता था, लेकिन समय की चाल ने इसमें बड़ा परिवर्तन ला दिया अब सीधी और सपाट बात कहने वाला सभी के आंख की किरकिरी बन जाता है। अब दौर है चाटुकारिता और लोगों की पसन्द का, ये ही बजह है कि जो दिखता है वो ही बिकता है। हालांकि इन बातों का मेरे इस लेख से कोई संबंध नहीं है लेकिन आज के सियासी दौर में ये ही बाते ताज हासिल कराती हैं। मैं भारतीय जनता पार्टी के दूसरे कार्यकाल के लिए हासिल हुई प्रचण्ड जीत पर रोशनी डालना चाह रहा था ,लेकिन अब ये जरूरी हो गया कि मैं भारतीय जनता पार्टी के पहले कार्यकाल पर आपकी तवज्जो चाहूंगा। मैं शुरूवात करता हूं 2014 के चुनाव की जिसमें भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयेगी दलों ने मिलकर यू.पी.ए. सरकार को न सिर्फ अपनी आंधी में उड़ा दिया वल्कि विपक्ष का हक भी छीनने का काम किया। तमाम राजनीतिक पण्डितों ने इसे मोदी के जादू की संज्ञा दी तो कुछ ने यू..पी.ए.सरकार में हुए भ्रष्टाचार को उनकी असफलता का जिम्मेदार ठहराया। लेकिन इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों को प्राप्त हुई 282 सीटों और फिर 2019 में में हासिल हुईं 303 सीटों की कहानी बदली हुई राजनीतिक सोच की पराकाष्ठा है।

इस जीत के हीरो नरेन्द्र मोदी और सफल रणनीतिकार अमित शाह जिन्हें आधुनिक चाणक्य कहा जाये तो शायद गलत नहीं होगा। आपको इस बात का अन्दाजा है कि इस बार भाजपा को पिछले चुनाव के मुकाबले 33 फीसद ज्यादा मत क्यों हासिल हुये ? जबकि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में ऐसे कोई भी कार्य नहीं हुये जो मत प्रतिशत को बढ़ाने में सहायक होते। मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में जो भी कदम उठाये उस पर देश की आवाम नाखुश ही दिखी एक नहीं कई फैसले थे वो चाहे नोटबन्दी का फैसला हो, राफेल विमान सौदा हो जी.एस.टी हो या फिर सवर्णों को मिलने वाला 10 फीसद आरक्षण हो कहीं पर भी सरकार जनता के विश्वास को नहीं जीत पाई थी। अन्त में बेरोजगारी ऐसी समस्या थी कि अपना कार्यकाल खत्म करने तक मोदी सरकार इसके लिए कोई भी ठोस कदम उठा पाने में नाकामयाब ही रही, लेकिन फिर भी अगले चुनाव में मत प्रतिशत का बढ़ना हैरत में डालता है। दरअसल इस पूरी प्रचन्ड जीत में वो मनोवैज्ञानिक अटैक था जो हर किसी को पढ़ना नहीं आता और इसको सही तरह से पढ़ा आधुनिक चाणक्य अमित शाह और मोदी ने और वो था भारत विरोधी मानसिकता रखने वालों के खिलाफ अटैक जिसे सर्जिकल स्ट्राईक कहते हैं । हालांकि अटल बिहारी वाजपेई जी के समय में भी कारगिल युद्ध हुआ था लेकिन उसका इतना फीडबैक नहीं मिला जितना मोदी और अमित शाह की जोड़ी को पुलवामा अटैक के बाद हुई सर्जिकल स्ट्राईक से मिला।

पुलवामा हमले के बाद हिन्दुस्तान की आवाम में जिस कदर गुस्सा था वो जायज था देश के हर हिस्से से ये ही आवाज आ रही थी कि पाक्स्तिान को उसके इस दुःस्साहस पर सख्त कार्यवाही होनी ही चाहिए । आखिरकार मोदी सरकार ने ठोस कदम उठाते हुये पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राईक करके देश की आवाम को अपने पक्ष में कर लिया । ये मोदी सरकार की वो कामयाबी थी जिसकी खुशी में आवाम मोदी सरकार की नाकामयाबी के दर्द को खुशी-खुशी सह गई। जिक्र था मनोवैज्ञानिक सोच और रणनीति का तो ये बात सभी को मालूम है कि पड़ोसी देश के अन्दर होने वाले हर चुनाव में वहीं पार्टी कामयाबी के परचम लहराती है जो हिन्दुस्तान के खिलाफ जहर उगलने में महारत रखती हो यानि भारत विरोधी मानसिकता की धुरी पर ही वहां हर चुनाव होते हैं । ठीक वैसे ही 2019 का चुनाव पाकिस्तान विरोधी मानसिकता की धुरी पर आधारित था । आतंक का पर्याय बन चुके पाकिस्तान में इसी विचारधारा का अनुसरण किया जाता है और वहां के युवाओं को भारत के खिलाफ आतंकवाद की आग में झेांक दिया जाता है जिनको पाकिस्तान की निलिटीª और पैरामिलिट्री फोर्स का संरक्षण हासिल रहता है। देश के अन्दर काश्मीर समस्या एक अनसुलझी गुत्थी की तरह है जिसके जरिये मौजूदा सरकार आसानी के साथ अपना कार्यकाल पूरा कर सकती है , लेकिन इससे भी ज्यादा गम्भीर समस्या देश के अन्दर मौजूद हैं वो हैं बिजली,पानी,शिक्षा,स्वास्थ,चिक्त्सिा, रोजगार जैसी बुनियादी सुविधायें जिसे दे पाने में सरकार असहाय है। आये दिन अस्पतालों में सैंकड़ों की तादाद में चिक्तिसा सुविधाओं के अभाव में हंसता खेलता बचपन काल के ग्रास में समा रहा है ।

किसान अभी भी बेहाल है, युवा रोजगार के अभाव में नशे का आदी हो रहा है जिसके कदम धीरे-धीरे अपराध की दुनिया की तरफ बढ़ रहे हें। संसद के अन्दर संविधान की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं ऐसा प्रतीत होता है कि संसद न होकर धर्म का अड्डा हो। जब संसद से ही धार्मिक उन्माद भरे स्वर निकलेंगे तो बाहर धर्मान्ध मॅाब लिंचिंग नहीं करेगें तो और क्या करेंगे ?। भ्रष्टाचार में ये देश आकंठ डूबा हुआ है सरकार गाय, गंगा में व्यस्त है विधायिका न्यायपालिका पर भारी है अधिकारी सड़कों पर पिट रहे हैं कानून डरा सहमा खड़ा है और सिस्टम भ्रष्टाचार में मस्त है । देश में स्त्री की आवरू सुरक्षित नहीं ह,ैं इंसान की जान की कीमत कुछ भी नहीं मानव अधिकार आयोग नाम का है और महिला आयेग दिखावे का । गरज ये है कि अब हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि देश की आवाम भी भ्रष्टाचार की अभ्यस्त हो चुकी है। सरकार ने नोटबन्दी और कम्पनियों के बन्द करने के फैसले को भ्रष्टाचार रोकने में बड़ा कदम बताया गया था इन बातों से देश को क्या फायदा हुआ भ्रष्टाचार कितना खत्म हुआ ये आप हम सब जान रहे हैं।

विदेशी नीति के चलते हम अपनी कामयाबी का कितना भी परचम लहरा लें लेकिन देश के आन्तिरक मामले में हम कितने सफल हैं ये मंथन का विषय हो सकता है। किसी भी देश के खुशहाल और समृद्ध हाने का आंकलन देश के आवाम की खुशहाली और समृद्धता से होता है। रही भारत की विदेशों में बढ़ती साख तो ये भी देखने का विषय है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री ने जितने विदेशी दौरे किये हैं क्या उतने दौरे अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने भी किये ह,ै शायद इसका जवाब भी हमें तलाशना होगा। बहरहाल आज भले ही पड़ोसी मुल्क अन्र्तराष्ट्रीय पटल पर अलग पड़ चुका हो जिसे हमारे देश के लोग भारत की सरकार की कूटनीतिक सफलता का गाना गाते हों लेकिन अमेरिका और चीन जैसे मजबूत देश आज भी पाकिस्तान का समर्थन करते हैं ,उसका कारण साफ है कि अमेरिका जैसा साधन संपन्न देश पाकिस्तान का स्लीपर सेल है। ये देश पाक्स्तिान के भारत विरोधी रूख का फायदा उठा रहे हैं, हमें इस बात को नजर अन्दाज भी नहीं करना चाहिए। बहरहाल आज की सियासत बिल्कुल उन्हीं बातों का अनुसरण करते हुये है जो पाकिस्तान की सियासत में है जितनी पाकिस्तान विरोधी बातें सामने लाने में मौजूदा सरकार कामयाब रहेगी उतना ही मत प्रतिशत बढ़ायेगी। सवाल ये है कि पाकिस्तान विरोधी मानसिकता से सियासत में अपने पैर जमाने वाले और पदलोलुपता की चाह रखने वालों को तो इसका फायदा है लेकिन देश की जनता का इससे कोई फायदा होने वाला नहीं है । आज भाजपा की सरकार ने अपनाी सत्ता में जड़ें जमाने का जो मूलमंत्र बनाया है वो इसी मानसिकता पर आधारित है इसमें कोई दो राय नहीं है।

सलीम रज़ा

देहरादून,उत्तराखण्ड

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