भारतसत्य
कहते हैं कि मजदूर का पसीना सूखने से पहले उसकी मजदूरी दे देनी चाहिए ये बात किसी हद तक ठीक है, लेकिन क्या उसका अनुसरण इस संदर्भ में हो रहा है? क्या हम सही में श्रमिकों के हितों की बात कर रहे हैं? क्या हम श्रमिकों के साथ दोहरा चरित्र नहीं निभा रहे?क्या आज भी हम श्रमिकों को हेय दृष्टि से नहीं देखते हैं? क्या 113 साल बाद भी श्रमिक अपने हक और अधिकार पाने के लिए जद्दोजहद नहीं कर रहा है?ये सवाल अहम और सबसे बड़ा है। अगर सब कुछ वैसा ही है तो फिर मजदूर दिवस मनाने का कोई भी औचित्य नहीं रह जाता। दरअसल इस दिवस को मनाकर हम परम्परा का सिर्फ र्निवहन कर रहे हैं लेकिन सही मायनों में मजदूर की पीड़ा उसका समाज में दायरा सीमित होना बहुत ही दुःखदायी है। कितना दुश्कर और पीड़ादायक है कि मानव सभ्यता के इतने लम्बे सफर के बाद भी एक ऐसा तबका है जिसे हम मजदूर कहते हैं। वैसे अगर वेद यानि ऋग वेद को देखें तो उसके अन्दर पुरूष सूक्ति में शारीरिक श्रम करने वाले श्रमिक को शूद्र कहा गया है, लेकिन हैरान कर देने वाली बात है कि आज तक हर धर्म के लोग इंसान की महत्ता बताने वाले अपने-अपने धर्मों में शूद्र की संख्या बनाये रखने में यकीन करते है?ं इस हिसाब से तो शूद्रों की संख्या बेशक बढ़ी है। जिस श्रमिक को हम आज भी हेय नजरों से देखते हैं तो लगता है हम निरकुंश होने के साथ लोगों को गुलाम समझने की बीमारी से ग्रस्त हैं। हमने कभी ये भी सोचाा कि इन श्रमिकों के बलबूते ही हमारी आर्थिक उन्नति है हम समाज के अन्दर अपने सिर को उठाकर चलते हैं तो उसमें इनका सबसे बड़ा योगदान है। मजदूर हमारे समाज की महत्वपूर्ण कड़ी है जिसे हम अपने अहंकार की चक्की में दिन-रात पीस रहे हैं। हम ये क्यों भूल जाते हैं कि देश, समाज,उद्योग और व्यवसाय को खड़ा करने के स्तम्भ ही कामगार और कर्मचारी हैं। किसी भी देश की तरक्की में सबसे बड़ा हाथ मजदूर और कामगार का होता है। 4 मई 1886 को शिकागों के हेमार्केट चैक पर जरूरत से ज्यादा काम लिए जाने से नाराज श्रमिकों ने हड़ताल कर दी और वहां इकठ्ठा हो गये तभी एक अप्रिय घटना ने जो मजदूरों पर किसी के द्वारा बम फेके जाने से घटी भगदड़ में पुलिस ने भी भीड़ पर फायरिंग कर दी जिसमें प्रदर्शन कर रहे कुछ श्रमिकों की दर्दनाक मौत हो गई थी। ये वो घटना थी जिसने पूरी दुनिया का घ्यान अपनी आाकर्षित कर लिया। इस दर्दनाक हादसे के बाद 1889 में अन्तराषर््ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में हर साल 1 मई को हेमार्केट नरसंहार में मारे गये बेकसूर श्रमिकों की याद में अन्तराषर््ट्रीय मजदूर दिवस मनाया जाने लगा। इसी दिन से इस दिवस पर अवकाष घोषित किया गया लिहाजा 1886 के बाद से ही मजदूरों और कामगारों के कल्याण श्रम दिवस का ऐलान किया गया था। इसमें कोई दोराय नहीं है कि कोई भी कम्पनी या संगठन वगैर श्रम के नहीं चल सकती, लिहाजा कम्पनियों और संगठनों को अपने मजदूरों और कर्मचारियों के साथ कभी भी जाति,धर्म,लिंग और विकलांगता के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए। उन्हें आठ घण्टें से ज्यादा काम नहीं कराया जाना चाहिए। मजदूरों और कामगारों की कैटेगरी न बनाकर उनका बराबर सम्मान करना चाहिए। श्रमिक भारतीय अर्थव्यवस्था और आधौगिक तरक्की का प्रेरणा स्त्रोत है, बहरहाल इस बात से भी इंकार नही किया जा सकता कि श्रमिकों के पास राजनैतिक प्रभाव भी है क्योंकि कुछ ऐसे श्रमिक मुद्दे भी रहे है जिन्होने राजनीतिक दलों को चुनाव में निभाई अपनी भूमिका से जिताया भी गया है। अलगरज श्रमिक हर क्षेत्र में अपनी भूमिका कड़ी मेहनत और ईमानदारी के साथ निभा रहा है कहने का मतलब है कि मजदूर मानवीय श्रम का सबसे बड़ा और सबसे आदर्श उदाहरण है। मजदूर हमारे सारे क्रिया-कलापों की धुरी है आज के मशीनी युग में भी मजदूर की आवश्यकता कम नहीं हुई है। आज जिस तरह से तमाम संगठनों से जुड़े श्रमिक और कामगार आये दिन सड़कों पर अपने हकों और अधिकारों से लड़ने के लिए सड़को पर उतर आते हैं जिसे देखकर लगता है कि 113 साल बाद भी मजदूर और कामगार तबके में वैसा ही असंतोष है जो अपने हकों के लिए तरस रहा है। मजदूर शब्द के दर्द को समझना बेहद जरूरी है उसका जीवन हर वक्त दांव पर लगा रहता है लेकिन उसके ऐवज में उसे मिलने वाली दिहाड़ी जिसे हम देकर अपने आप को उसकी सारी जिम्मेदारियों से छूट जाते है पर्याप्त नहीं है। सवाल ये उठता है कि क्या हम अपना जीवन सुखमय बनाने के लिए एक ऐसी मानव श्रंखला चाहते हैं जो हमारे सुखों से कमतर हो यानि ये धारणा हमारे अन्दर रची बसी है कि वो हमसे ज्यादा सुखी न रहे आखिर क्यों? हम आप सब जानते हैं कि इंसानी जीवन नश्वर है और ये हमें कई लाख योनियों से गुजरने के बाद प्राप्त हुआ है, तो क्यों न अपने सम्पूर्ण जीवन को सुख और आनंद के साथ गुजारे और दूसरों को भी गुजारने दें। लेकिन एक मजदूर के लिए हमारी व्याख्या और सोच अलग है। हम इस बात को सोचते हैं कि श्रमिक होना कर्मों का फल है और इसीलिए उसे नरकीय जीवन जीने को मजबूर होना पड़ा अगर कर्म ही पूजा है तो साधक यानि श्रमिक का कर्म निष्फल नहीं होगा, उसके भविष्य और कर्मों को दिशा देने वाला एक वो बड़ा तबका है जो इन्हें आगे बढ़ने नहीं देता। नतीजा ये होता है कि श्रमिक की जिन्दगी उनका भाग्य रसूखदारों की मुठ्ठी में कैद है जो उनको उस नरकीय जीवन से बाहर नहीं आने देती। उन रसूखदारों ने उनका सामाजिक दायरा सीमित कर दिया उनकी पहचान उसी दायरे तक सिकुड़ सिमट कर रह गई जो सुख रूपी हरियाली और मुस्कान रूपी वारिश से महरूम है। आज होटलों,ढ़ाबों छोटी-बड़ी फैक्ट्रियों, घर के काम-काज के साथ ईंट भट्टों पर बंधुआ मजदूरों के रूप में सैकड़ों श्रमिक मिल जायेंगे जो इन रसूखदारों के अहसानों और रकम के चलते अपना दिन-रात एक कर रहे हैं। इनके लिए मजदूर दिवस कोई मायने नहीं रखता इनका भाग्य विधाता ने नहीं इन रसूखदारों की कलम से लिखा गया है, जिसने इनके अन्दर के साहस को क्षीण कर दिया है।

सलीम रज़ा

देहरादून उत्तराखण्ड।

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