समृति जुबिन इरानी

एक महिला जो टीवी स्क्रीन का चेहरा रही, उसने जब बोलना शुरू किया तो मीम्स बनाने वालों को मसाला मिल गया। वह ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी से नहीं पढ़ी, इंटरमीडिएट पास करने के बाद बमुश्किल स्नातक का पहला वर्ष पूरा किया। उसके अपने संघर्ष रहे हैं जिसे वह शोकगीत की तरह नहीं गाती। जो मिला, सहर्ष स्वीकारा और उसमें लगी रही।
उस नेत्री को जब अमेठी में कांग्रेस के कर्णधार राहुल गाँधी के सामने खड़ा कर दिया गया तो वह भी समझती ही होगी कि रास्ता उसके लिए बेहद कठिन है। गाँधी परिवार के गढ़ में अपना घर बनाना किसी के लिए आसान न होता, वह अपेक्षाकृत कम अनुभव रखती थी। वो हार गयी और राहुल गाँधी जीत गये। राहुल ने अमेठी जाना वैसे ही छोड़ दिया जैसे बड़े होते बच्चे अपना पुराना घर-गांव छोड़ देते हैं।
वह महिला, जिसे जनता ने नकारा था, वहां जाती रही, लोगों से मिलती रही, उनकी समस्याएं सुलझाती रही, मदद करती रही। उसे भी पता था कि अगला चुनाव अगले दिन नहीं पूरे पांच वर्ष बाद होगा। लोगों ने उसे उथला समझा, उसने सभी के हिस्से का धैर्य स्वयं में समाहित कर लिया। वह लगातार बिना शिकायत के काम करती रही और पांच वर्ष बाद गाँधी परिवार का गढ़ उसका घर हो गया।
उसके किसी सहायक, क़रीबी की हत्या पर जितना दु:ख है उतना ही यह तस्वीर तसल्ली देती है। चुनाव जीत चुकी स्मृति ईरानी सुरेंद्र सिंह की मौत पर आनन-फ़ानन में अमेठी पहुंचती हैं, परिवार के ग़म में ग़मगीन होती हैं और शव यात्रा के दौरान शव को कंधा देती हैं। यह तस्वीर यकीन दिलाती है कि सुरेंद्र सिंह ने अच्छे उम्मीदवार के लिए दिन-रात मेहनत की। यह तस्वीर दिलासा देती है कि चुनाव ख़त्म होने के बाद भी उनकी नेत्री उनके बीच, उनकी तरह है और रहेगी।
किसी देश की बेटी को एलिज़ाबेथ या प्रियंका गाँधी जैसा होना चाहिए या नहीं, मैं नहीं जानती लेकिन यह तस्वीर मुझमें वह ऊर्जा भरती है जिसके साथ मैं यह कह सकूं कि देश की बेटी को, देश की नेत्री को स्मृति ईरानी जैसा होना चाहिए। वह स्मृति जो अचानक कभी भी अमेठी पहुुंच जातीं और चौपाल में बैठकर लोगों से बातचीत करतीं। वह स्मृति जो रास्ते चलती महिलाओं से उनका हाल-चाल लेते हुए उनके आंगन की खटिया पर पहुंच जातीं। वह स्मृति जो आग लगने पर लोगों को दिलासा देतीं, समझातीं कि नुकसान नहीं होगा, चिंता न करें। दमकल वालों से मुख़ातिब होतीं और आग बुझाने के लिए ख़ुद ही हैंडपम्प चलाने लगतीं। वो स्मृति जिन्हें पता है कि 30 मई को शपथग्रहण समारोह है और दर्जन भर ज़रूरी काम हैं, लेकिन वे सबकुछ छोड़कर उसके लिए पहुंचीं जो उनके साथ खड़ा रहा। यह तस्वीर इंसान का इंसानियत पर भरोसा मज़बूत करती है। यह तस्वीर उम्मीद जताती है कि अमेठी वालों ने वह पाया है जो गर्मी-सर्दी-पतझड़-बरसात में उनके लिए तत्पर होगी। जब कोई नेत्री अपने क्षेत्र की ज़िम्मेदारी उठाते हुए बिल्कुल सामान्य हो जाती है तो वह मंत्रमुग्ध कर देती है।

लेखक Riva s singh

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