शाहबानों से लेकर सायराबानों तक न जाने कितनी बार पढ़ा गया न जाने कितनी बार बहस का मौजू बना तीन तलाक बिल आखिरकार 2019 में पारित हो ही गया। मेरे विचार से इस कानून को एक पत्नि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ये कानून यदि एक बहन के रूप में देखा जायेगा तो इस सामाजिक कुरीति को दूर किया जा सकता है, यदि मुस्लिम समाज इस कुरीति के खिलाफ आगे आयेगा तो निश्चित रूप से ये कानून और भी ज्यादा प्रभावी बनेगा। भले ही इस तीन तलाक बिल के पीछे भारतीय जनता पार्टी की संकल्प वद्धता की तस्वीर लोगों को नजर आई हो लेकिन एक तीर से दो निशाने कैसे लगाये जाते हैं ये हर सियासी पार्टी को मोदी-शाह की जोड़ी से सीखना चाहिए। तीन तलाक बिल पूरी तरह से सियासी कौशल की चासनी में डूबा हुआ रसगुल्ला है जिसकी मिठास में महिलायें उस कसैले स्वाद का अनुभव नहीं कर पा रही हैं।

बहरहाल हिन्दुस्तान में कई दशकों से देखा जा रहा है कि चुनाव में महिलाओं का प्रतिशत पुरूषों के मुकाबले ज्यादा रहता है ,वहीं देश की मुख्य विपक्षी पार्टियां मुस्लिम वोटों के तुष्टिकरण की राजनीति से अपनी कुर्सी सुरक्षित करती रही हैं, उनके लिए तीन तलाक बिल का दोनों सदनों में पारित होना भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक कौशल का परिचायक है। तलाक-ए-बिद्दत यानि तीन तलाक जैसी मनमानी कुप्रथा को बाहर कर मुस्लिम विवाह संरक्षण विधेयक 2019 पर 30 जुलाई को संसद के दोनों सदनों ने अपनी सहमति से पास कर दिया। सही मायनों में इस विधेयक का पारित होना सामाजिक न्याय की सिम्त में एक अभूतपूर्व कदम है। इस बिल के पारित होने के बाद यकीनन शाहबानों की रूह को सूकून मिलेगा, भले ही राजनैतिक स्वार्थों के चलते वो न्याय नही पा सकीं, लेकिन सायराबानों ने उस लड़ाई को जारी रखते हुये जीत हासिल कर अपना लोहा मनवाया। दरअसल शाहबानों के मामले में जब सुप्रीमकोर्ट ने सी.आर.पी.सी की धारा 125 के तहत उनके पति को दोषी ठहराते हुये फैसला सुनाया था उसी वक्त हिन्दुस्तान में एक नया उबाल आ गया। क्योंकि ये फैसला वो था जो सभी धर्मों पर इन हालातों में लागू होता था, मतलब साफ था कि अदालत ने तीन तलाक को अपराध की श्रेणी में रखा था। पूरे देश में मुस्लिम धर्मगुरूओं ने इसे शरियत के कानून में हस्तक्षेप मानते हुये इसका विरोध किया।

रूढिवादी परम्पराओं के हाथों मजबूर मुसलमानों का कहना था कि न्यायालय का यह फैसला उनकी रिवायत के खिलाफ है। ऐसे में उठे इस भूचाल से राजनीतिज्ञों की कुर्सी खतरे में पड़ने लगी फिर वोटों की तुष्टिकरण की राजनीति ने आल इन्डिया पर्सनल ला बोर्ड को जन्म दिया जिसके सदर एम.जे.अकबर और सैययद शाहबउद्दीन थे। आंदोलन की धमकी से तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अदालत के धर्म निरपेक्ष फैसले को उलटकर मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण) कानून 1986 पारित कर दिया ओर इस तरह से तीन तलाक वैध हो गया । यहां एक बात ध्यान देने योग्य है कि उस समय कांग्रेस कां्रे सदनों में बहुमत हासिल था इसलिए पुरूष को प्रधान बताते हुये एक मजलूम औरत के न्याय पर सियासत की तलवार चल गई। अब तकरीबन चार दशक के बाद भारतीय जनता पार्टी ने इसे मानवीय क्रूरता मानते हुये तीन तलाक को अपराध की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है। ये कानून पुरूषों की स्वायतता पर कुठाराघात तो नहीं कहा जा सकता और न ही उनकें अधिकारों का हनन वल्कि इस रूढ़िवादी विचारधारा से बाहर निकलकर इस कुप्रथा को समाप्त करना है। इस कानून से उन मुस्लिम महिलाओं के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश की गई है जो इस कुप्रथा की वजह से जिन्हें आर्थिक कठिनाईयों के दौर से गुजरना पड़ता है, ऐसे में महिला स्वयं और अपने बच्चों की परवरिश किस तरह और कैसे करे ये सोचनीय सवाल था।

तीन तलाक बिल पर भले ही विपक्ष ने काफी हो हल्ला इसकी खामियों को लेकर किया हो या इस बिल में संशोधनों को लेकर प्रवर समीति के पास ले जाने को कहा हो जिसे सरकार ने नहीं माना। अब पहले से और ज्यादा संशोधनों के साथ इस बिल को पारित किया गया हैं, इसमें मानवीय संवेदनाओं का ख्याल रखा गया है जिसे हम मानवीय रूप कह सकते हैं। इस बिल में जहां पुरूष को तीन साल की सज़ा और जुर्माने का प्रावधान है तो वहीं आवेश में कहे गये तीन तलाक जैसी भूल को सुधारने के लिए पति-पत्नि में सुलह की भी गुंजाईश रखी गई है जो मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में संभव है। मौजूदा बिल में खासतौर से विवाद इसे आपराधिक बनाये जाने को लेकर था, इस तर्क को शायद नकारा भी नहीं जा सकता लेकिन हमें ये बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि इस को आधार बनाकर एक कुप्रथा का अंत करने वाले कानून के रास्ते में रोढ़ा भी नहीं बनना चाहिए। कोई भी कानून बनाया जाता है तो प्राथमिक स्तर पर कमियां रह ही जाती हैं लेकिन इसके लिए चर्चा के रास्ते खुले होने चाहिए ,क्योकि चर्चाओं से ही सकारात्मक रास्ते जन्म लेते हैं। अब चूंकि तीन तलाक कानून संसद के दोनों सदनों में पारित हो चुका है और बहुत जल्द ही ये कानून का रूप ले लेगा, लेकिन इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि जिस समाज के लिए कानून बनाया जा रहा है उस समाज के लोगों को भी अपनी सोच को सकारातमक दृष्टिकोंण अपनाते हुये आगे बढ़ कर समय के अनुसार बदलाव लाने का अहद करना चाहिए।

जिस तरह से मुस्लिम महिलाओं ने इस कुप्रथा से निजात पाने के लिए अपने कदम आगे बढ़ाये थे ये बेहतर पहल थी। सबसे अच्छी स्थिती तो तभी कही जा सकती है जब समाज खुद कानून बदलने की पहल करे लेकिन वो स्थिती बहुत कठिन होती है जब कानून के जरिये समाज में बदलाव लाया जाता है तो विरोध के स्वर तो उभरते ही हैं। इसके कई जीवंत उदाहरण हैं जिसमें सती प्रथा जैसी कुप्रथा और सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश जेसी प्रथा शामिल है। दूसरी सबसे बड़ी बात जिसे लेकर लोगों में संशय बना होता है वो है कानून का प्रभावी न होकर उसका दुरूपयोग होना दहेज प्रथा और बाल श्रम भी इसके उदाहरण है। मौजूदा हालात में तीन तलाक जैसी कुप्रथा के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी का ये साहसिक कदम है लेकिन कहीं न कहीं इसमें राजनीतिक बू आती है। भारतीय जनता पार्टी अच्छी तरह से जानती है कि मुस्लिम वोट का प्रतिशत उनके पक्ष में कम रहता है वमुकाबले उन पार्टियों के जो भारतीय जनता पार्टी को हराने का दमखम रखती हैं। भारतीय जनता पार्टी ने ऐसे में तीन तलाक बिल बिल लाकर उन पाटिर्यो पर अंधेरा कायम कर दिया जिन पार्टियों की राजनीति का आधार मुस्लिम वोट बैंक पर निर्भर था वो सिर्फ भाजपा विरोधी था। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी ने तीन तलाक बिल के जरिये मुस्लिम वोट बैंक में सेंधमारी जरूर करने की कोशिश करी है।

भारतीय जनता पार्टी को भले ही मुलिम वोट का वो प्रतिशत हासिल न हो सके लेकिन परिवार के अन्दर जरूर (महिला-पुरूष) वोट बांटकर अंग्रेजों की ‘‘फूट डालो राज करो’’ वाली नीति का अनुसरण किया है,इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब मुस्लिम वोट बैंक घर में ही एकजुट नहीं होगा तो फिर किसी और पार्टी को एकजुट वोट कहां से मिलेगा। बहरहाल, भारतीय जनता पार्टी ने तीन तलाक बिल पारित करके ये दिखा दिया कि प्रयोगवादी राजनीति तुष्टिकरण की राजनीति से कहीं अव्वल है और ये ही बात मोदी ओर शाह की जोड़ी ने कर दिखाई है।

देहरादून, उत्तराखण्ड

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