हमारे देश की एक खासियत है जिस पर शायद ध्यान नहीं दिया जाता है लेकिन है सौ फीसद सच। सच भी ऐसा जो हमें यानि मीडिया तंत्र को ही कटघरे में खड़ा करके घूरता हआ पूछता है कहां से ला रहे हो ये सब सत्य?। जरा देखिये देश में बलात्कार की कोई घटना होती है फिर उसके बाद महीनों तक अखबार या खबरिया चैनल बलात्कार का सीरियल बना लेते हैं। अब देखिये केन्द्र सरकार की प्रमुखता में मुस्लिम महिलाओं के तीन तलाक का बिल जो कभी संसद कभी राज्यसभा के बीच अभी हवा में तैर रहा है लेकिन अखबारों में आये दिन तीन तलाक से संबधित खबरे प्रमुखता से छापी जाती है,ं भले ही स्वर्ण परी हिमा दास की खबर किसी अखबार के कार्नर में चिपकी हुई क्यों न सिसक रही हो।

मेरी अपनी राय है शायद इससे कोई इत्तेफाक रखे या न रखे लेकिन सच है कि ऐसी प्रमखुता से चैलेन्ज के रूप में छपने या दिखाई जाने वाली खबरे उन अशिक्षित और अनडेवलप माईन्ड के एक बड़े समूह को विचलित कर देती हें, जो एक समूह या दल के रूप में बदले की आग में झुलस रहे होते हैं, जिन्हें खबर की सत्यता से कोई लेना देना नहीं होता, इनका उन्माद ही इनकी शिक्षा सरित्र का सर्टिफिकेट होता है। मेरे ख्याल से ऐसे ही लोग सियासत के धुरन्धर लोगों के कृपा पात्र होते है, जिनको भावुक करके इनके अन्दर का उन्माद जगाया जाता है। अब देखिये इस वक्त अगर कोई खबर रोज मर्रा की चर्चा के साथ अखबारों की सुर्खी और खबरिया चैनलों की टी.आर.पी बढ़ाती है तो ये सियासी संरक्षित कृपा पात्र लोगों के द्वारा खबर को अपने तंत्र तक फरवर्ड करते करते नैरेटिव करते-करते नेगेटिब बना देते ह,ैं जिस्क्ज्ञ खैफनाक चेहरा मॅाब लिंचिंग के रूप में देखने को मिल रहा है।

माॅब लिंचिंग की घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि से हैरान होकर उच्चतम न्यायालय ने मॅाब लिंचिंग प्रभावित राज्यों से जबाव मांगा है। यह सोच का विषय है और इस पर सरकार के साथ हम आप को ीज्ञभ् गम्भीरता के साथ किसी भी वैचारिक सोच के बदलाव के वगैर निषकर्ष पर पहुंचना होगा। कितनी अजीब बात है कि हमारे देश की आबादी का तकरीबन 60 फीसद जिनमें औसत15 साल से 60 साल े आयु वर्ग के लोग हैं जो काम कर सकते हैं लेकिन काम से अयोग्य बने इस बड़े हिस्से का फीसद सोशल मीडिया के विभिन्न एप्लीकेशन्स का इस्तेमाल करके सोशल मीडिया पर अपना समय व्यतीत करता हैं। कैसा दुर्भाग्य है कि इनका इस्तेमाल देश को सही सिम्त मे ले जाने की वजाय सोशल मीडिया पर भ्रामक अफवाह फैला कर भीड़ तंत्र को जमा करके अविश्वास और असुरक्षा का माहौल क्रिएट करने के लिए किया जा रहा है। ये ही वो लोग हैं जिनसे समाज और देश दोनो को खतरा बना हुआ है। सोशल मीडिया का इस्तेमाल लोगों को जागरूक बनाने का है लेकिन ये कैसा सोशल मीडिया का इस्तेमाल जहां एक गलत खबर से पत्नि का सुहाग उजड़ रहा है तो कहीं पत्नि की कोख उजड़ रही है, किसी का भाई दम तोड़ रहा है ये समाज के माथे पर कलंक तो है ही साथ देश को शर्मसार कर देने वाली घटनायें है,ं जो सरकार की मंशा पर भी सवालिया निशान खड़ा कर देती है।

आज आप देखते होंगे सोशल मीडिया पर हर सियासी पार्टी और सरकार के मंत्री एक्टिव रहते हैं जरा उनकी सोशल मीडिया पर उपस्थिी और किसी दर्दनाक घटना के बाद की प्रतिक्रिया पर नजर डालें तो पता चल जायेगा कि इस भीड़ तंत्र के हौंसले क्यों और किसकी शह पर बुलन्द हैं। कोई भी बात ज्यादा दिन तक परदे में नहीं रह सकती आज जो नजारा हम देख रहे हैं वो किसी से भी छिपा नहीं है, क्योंकि हर सियासी दल के लोग अपनी-अपनी विचारधाराओं से ग्रस्त है। इन सियासी दलों के शुभचिंतकों में से एक बड़ा हिस्सा उन लोगों का है जो कट्टरपंथी होने के साथ-साथ रियूमर फैलाने का काम करता हैं। जरा देखें सन् 2010 के बाद शहर हो या गाॅंव शिक्षा और रोजगार में खास इजाफा नही हुआ है लेकिन इंटरनेट और सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर खासी भीड़ देखी गई है, इस भीड़ में वो लोग ज्यादा सक्रिय है जो या तो बेरोजगार है अशिक्षित हैं या फिर बिल्कुल थम्स अप टाईप लोग जो अफवाह और झूठी खबरे प्रचारित और प्रसारित करके भीड़ तंत्र का हिस्सा बनते हैं।

आज जैसे हालातों को देखकर जरूरी हो गया है कि सोशल मीडिया खासतौर से व्हाटस एप और इंटरनेट मैसेजिंग जो झूठ फैलाने का सरल साधन बन गये हैं इन पर कानूनी लगाम कसी जाये। भले ही इस पर प्रयास किया गया है लेकिन ये नाकाफी है। क्योंकि व्हाटस एप पर भेजी गई झूठी खबर या फोटो ,वीडियोज की सत्यता लगा पाना मुश्किल है। लोगों के कहने और मानने पर यकीन नहीं किया जा सकता लेकिन माॅब लिंचिंग के आंकड़े बताते हैं कि 2014 से ही गौ रक्षा के नाम पर भीड़ हिंसा की शुरूआत हुई है। धर्म और गाय के नाम पर शुरू हुई हिंसा जिसे माॅब लिंचिंग का रूप दिया गया जिसमें गौ हत्या और चोरी की घटनाओं में भीड़ द्वारा हत्यायें करी गईं। ं दरअसल भीड़ का न तो कोई चेहरा होता है और न ही स्वरूप लिहाजा उन तत्वों को समझ में आ गया कि इस तरह की बारदात करके आसानी से बचा जा सकता है, इसलिए ऐसी आपराधिक घटनाओं में तेजी से उछाल आया था। एक रिपोर्ट के मुताबिक माॅब लिंचिंग की घटनाओं में लिप्त गिरफ्तार लोगें में से मैट्रिक पास कुछ गैर शिक्षित और कुछ ने स्कूल की सूरत ही नहीं देखी थी पाये गये थे इन सबके साथ इन लोगों का नशे का आदी होना भी पाया गया था। वहीं पुलिस की दलील है कि गांवों में अशिक्षा गरीबी ओर बेरोजगारी से त्रस्त लोग सारकार की कार्यशैली से नाराज होकर भीड़ के रूप में ऐसी लोमहर्षक वारदातों को जन्म देते हैं लेकिन ये एक तरह का सेफ कार्नर है।

दरअसल धार्मिक कट्टरता और धर्म की राजनीति के दरम्यान पनपे विष को इस तरह की घटनाओं में इस्तेमाल किया जाता है जो निहायत ही अफसोसजनक है। सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाले नेतागण जब इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने वालों का सम्मान करते हुये फोटो अपलोड करते हैं तो इनकी नियत पर भी बहुत सारे सवाल खड़े हो जाते हैं। बहरहाल, क्या इस तरह की वारदातों के दिनों-दिन हो रहे इजाफे से ऐसा नहीं लगता है कि बहरहाल, क्या इस तरह की वारदातों के दिनों-दिन हो रहे इजाफे से ऐसा नहीं लगता है कि लोगों का प्रशासन और न्याय व्यवस्था पर से विश्वास उठता जा रहा है। आजादी के 72 साल बाद भी हम एक आदर्श और सभ्य समाज की स्थापना कर पाने में नाकाम रहे हैं। इस तरह की किसी भी अमानवीय घटना में किसी भी मंत्री या नेता की सकारात्मक टीका-टिप्पणी करना इस बात का द्योतक नहीं है कि इस भीड़ तंत्र को ऐसे ही लोगों की शह और संरक्षण मिला हुआ है अगर इसे हिंसक सियासत कहा जाये तो शायद गलत नहीं होगा।

सलीम रज़ा

देहरादून उत्तराखण्ड

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