हमारे देश में महिलाओं के उत्थान, सम्मान और उनके अधिकार दिलाये जाने के लिए वृहद स्तर पर आयेजन किये जाते रहे हैं। महिलाओं के लिए बड़ी-बड़ी गोष्ठियों का आयोजन भी किया जाता है।आखिर हम सब मातृ शक्ति का ख्याल भी तो बहुत रखते हैं। लिहाजा इस मुद्दे पर हमारे देश और राज्य की सरकारें भी जरूरत से ज्यादा संवेदनशील रहती हैं। उनके हुकूक के लिए सरकार में महिला सशक्तिकरण मंत्रालय भी बनाया हुआ हैं। वहीं दूसरी तरफ इसी मंत्रालय के समानान्तर महिला आयोग भी काम करता है, जो देश और राज्य में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार का स्वतः संज्ञान भी लेने की क्षमता रखता है। सही मायनों में हम महिलाओं के संरक्षण, सम्मान की बात करते हैं। हमारा दायित्व भी बनता है कि हम महिलाओं के प्रति संवेदनशील हों। ये हमारा कर्तव्य मात्र ही नहीं बल्कि हमारा फर्ज भी है, लेकिन क्या हम अपना फर्ज सही तरह से निभा पा रहे हैं? ये सबसे बड़ा सवाल है। अगर हम इसकी गहराई में जायें तो जो बात निकलकर बाहर आयेगी, वो है हमारी मानसिकता। हम अपनी जैसी मानसिकता रखते हैं वैसी ही तस्वीर देखते हैं। इसके पीछे वो सारी बाते हैं जिनके बीच हम अपना दिन गुजारते हैं। इस पूरे दिन में हम जो भी अपने आस-पास देखते हैं रात में वही विचार हमारे अन्दर निद्रा के साथ चले जाते हैं जो ख्वाबों के जरिये हमें पूरी रात हर पहलू से अवगत कराते हैं। उसका असर ये होता है कि इसका प्रभाव हमारे शरीर के उन अंगों को प्रभावित करता है जिससे इंसान के अन्दर एक अजीब सी सिहरन या गुदगुदी पैदा होती है। अब ये हमारे विवेक और सहनशीलता पर निर्भर करता है कि हम उसे स्वप्न में धिक्कारते हैं या उसे ख्वाब में दुबारा देखने के लिए अगली रात आने का इन्तजार करते हैं।अगर इसमें बेकरारी होगी तो निश्चित ही ये इंसान की मानसिकता को बदलने की कुब्बत रखती है। अब इंसानी मानसिकता को बदलने वाले कारक कौन से हैं तो इसका कारण भी महिला ही मानी जाती है। वैसे ये हलक से नीचे न उतरने वाली बात है लेकिन सच्चाई से भी मुह नहीं मोड़ा जा सकता।यहां हमारी महिलाओं को जरूर तकलीफ होगी कि मैं महिलाओं को दोषी क्यों ठहरा रहा हूं। लेकिन ऐसा नहीं है,दरअसल इसमें केवल महिलाऐं ही दोषी नहीं हैं वल्कि महिलाओं के ग्लैमर्स की चकाचैंध की तरफ बढ़तें कदम और उनको इस चकाचैंध की तरफ ले जाने वाले चन्द लोग और विज्ञापन कंपनियों के साथ सरकार का कमाउ सूचना और प्रसारण मत्रालय भी बराबर का दोषी हैं।आपने देखा होगा कि आज के दौर में निजी संस्थानों से लेकर सरकारी और अर्ध सरकारी कार्यालयों तक सभी विभागों में रिसेप्शनिस्ट का पद एक तरह से महिलाओं के लिए आरक्षित समझा जाता है क्यों? काल सेन्टरों में भी महिलाओं की अधिकता देखी जा सकती है क्यो?ं आप कहीं चले जाये अधिकतर विभागों में महिलायें जरूर देखी जा सकती है अच्छी बात है महिलाओं को पुरूषों के बराबर खड़ा करने के लिए इसे एक बहुत बड़ा कदम भी माना जा सकता है। क्योंकि जब महिलायें आत्मनिर्भर होंगी तो वों समाज के उन लोगों से मुकाबला करने में सक्षम हो जाती है जो उनको सिर्फ एक दिल बहलाने का जरिया समझते है। अब सवाल ये उठता है कि जहां पर महिलाये स्वाबलम्बी और आत्मर्भिर होती हों तो फिर कामकाजी महिलाओं के साथ आये दिन शोषण के मामले सामने आते है क्यों ? उसमें दलील ये दी जाती है कि महिलायें अपने ड्रेस कोड पर ध्यान दें।लेकिन ये बातें सिर्फ मंचों और डिबेट तक ही सीमित रहती हैं ,जबकि धरातल में इस पर कोई भी संवेदनशीलता नहीं दिखाई देती है। इसके लिए दोषी हमारी कभी न बदलने वाली मानसिकता और उससे ज्यादा दोषी हैं वे विज्ञापन कम्पनियां जिनमें महिलायें उनके सील बन्द उत्पादों के लिए अपने खुले जिस्म का इस्तेमाल करवाती हैं। माना कि माडलिंग एक कला है लेकिन कला का स्तर इसी तरह का होना चाहिए ये एक गम्भीर सवाल है। शहर के हर कोने पर इस तरह के विज्ञाापन बड़े-बड़े होर्डिग्स के रूप में अश्लीलता परोसते देखे जा सकते हैं,जबकि टीवी चैनल्स पर कंडोम से लेकर डियोड्रेन्ट के उत्तेजक और अश्लील विज्ञापन खूब प्रसारित किये जाते हंै।वहीं लेडीज इनरवीयर के विज्ञापन भी काफी तादाद में देखे जा सकते हैं, इन सभी में महिलाओं का जमकर इस्तेमाल किया जाता है। कहने का मतलब ये है कि देश के हर उत्पाद में महिलाओं की भागीदारी ज्यादा देखी जाती है, जिनको परोस कर हर कम्पनीयां अपने उत्पाद की मार्केटिंग और बिक्री बढ़ाती है। ऐसे में सूचना प्रसारण मंत्रालय, महिला सशक्तिकरण मंत्रालय और महिला आयोग अपने आंख और कान बन्द करे हुये हैं क्यों? जरूरत है ऐसे उत्तेजक और अश्लील विज्ञापनों पर पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए जो महिलाओं की सुन्दरता उनकी अदा और उनके अर्धनग्न जिस्म की प्रदर्शनी कराके मार्केटिंग की होड़ में लगी कम्पनियां अपनी जेबें भरती है। बहरहाल जैसा सुना और कहा भी जाता है और जैसी धारणा भी है कि जो दिखता है वही बिकता है।

सलीम रज़ा
देहरादून उत्तराखंड

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