संसार को छल-प्रपंच और माया कहने वालों ने बहुत भारी भूल की। यही नहीं सच और न्याय केलिए यह भी निर्धारित कर दिया कि सामान्य सांसारिक जीवन में इनका कोई स्थान नहीं। सच और न्याय का मार्ग *संसार* से अलग *संन्यास* का बना दिया।

बात यहीं पर रुक जाती तब भी ठीक था मगर कलियुग के नाम पर घोर *पापाचार-अनाचार-भ्रष्टाचार* को खुली छूट दे दी।

सामान्य विवेक यह कहता है कि मानव समाज विकसित हो रहा है, उत्कृत (Evolve) हो रहा है। मगर भारतीय समाज को यह कहकर गुमराह किया गया कि हम पतन की ओर बढ़ रहे हैं और अंत में पापाचार बढ़ता ही चला जाएगा। कोई इसे रोकने के लिए कुछ नहीं कर सकता। यह काम तो स्वयं भगवान ही करेंगे।

धर्म के नाम पर भोले-भाले लोगों की विवेक-बुद्धि को हर लिया गया। सच्चे सन्यासियों को संसार से दूरी बनाए रखने को विवश किया गया। यदि किसी ने प्रयास भी किया तो हतोत्साहित और प्रताड़ित किया गया। यदि वह फिर भी नहीं माना तो धार्मिक परीक्षा के नाम पर छल-प्रपंच के नाम पर उसकी जीवन लीला ही समाप्त कर दी गईं।

लेकिन फिर सत्य और न्याय ने न तो कभी खुद को हताश महसूस किया और न ही पराजित। वह निरंतर सत्याग्रह और संन्यास के मार्ग पर चलकर समाज को जागृत रखने प्रयास करता रहा और करता रहेगा क्योंकि *संन्यास और सत्याग्रह* का मार्ग संसार की *आध्यात्मिक और लौकिक उन्नति* केलिए है न कि सिर्फ और सिर्फ *विरक्ति*

धीरेन्द्र सिंह गंगवार (शिक्षक)लेखक

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