बाजार के बदलाव भविष्य का सटीक सन्देश देते हैं।इन दिनों टीवी पर एक विज्ञापन सबका ध्यान खींच रहा है। एक बड़ा ऊंट दुकान की तरफ जाता हैं और वहां से अपने मुंह में पानी की एक बोतल दबाकर अपने प्यासे बच्चे के पास पहुंचता है। बच्चा बोतल से पानी पीकर प्यास बुझाता है। पानी बेचने वाली कम्पनी इस विज्ञापन से अपने ब्रांड का नाम दर्शकों के जेहन में दर्ज कराने में सफल है। इस दृश्य में सिर्फ पानी बेचने वाली एक कम्पनी के कारोबार के विस्तार की जद्दोजहद मत देखिये। यह दृश्य भारत और समूचे विश्व के लिए एक बड़ी चेतावनी है। एक तरफ पानी की घटती उपलब्धता की, दूसरी तरफ पानी के बढ़ते कारोबार की।
भारत के तमाम राज्यों के साथ दुनिया के अन्य देशों में पेयजल का संकट तेजी से बढ़ रहा है। अफ्रीका के शहर केपटाउन में तो बकायदे पानी खत्म होने का वक्त भी तय हो गया था। अरब देश बर्फ के पहाड़ समुद्र के रास्ते से खींचकर लाने और उसके जरिये अपने शहरियों की प्यास बुझाने की कवायद में जुट गए हैं। अभी जब पाकिस्तान ने भारत के जवानों पर हमला किया, भारत ने अन्य जवाबों के साथ पाकिस्तान को भारत की सिंधु नदी का पानी रोकने की चेतावनी दी थी। दुनिया के लिए यह कोई नए किस्म की चेतावनी नहीं है। युद्ध काल में पानी एक बड़ा हथियार साबित होगा, चाहे किसी का पानी रोकना हो या किसी की तरफ छोड़ना हो। मगर सामान्य काल का जल संकट ज्यादा भयावह है। पेयजल की उपलब्धता लगातार घट रही है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन होने लगा है और समुद्र तल ऊंचे हो रहे हैं। ऐसे में पेयजल और जल संसाधनों पर हक जमाने का संघर्ष और तीव्र होना तय है। एक जमाने से कहा- सुना जा रहा है कि दूसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा। आप अपने शहर, गांव और अपनी रिहाइश के इर्द-गिर्द गौर से देखिए तो महसूस होगा कि पानी के लिए छोटे- छोटे युद्ध ( बोलचाल में इन्हें भले संघर्ष और झगड़ा कहें मगर इनमें कत्ल भी होते हैं और आत्महत्याएं भी।) अघोषित रूप से चल रहे हैं। पिछले दिनों पूरे देश ने देखा है कि बेंगलुरु और चंडीगढ़ में राज्य की नदियों के जल बटवारे के लिए किस तरह से युवाओं की टोलियां सड़क पर आईं और भीषण आगजनी की गई। ताल- तलैयों और झीलों के पानी के लिए गर्मियों में स्थानीय समुदाय कैसे आपसी हिंसा पर उतारू होता है? यह अब किसी से छिपा नहीं। मुश्किल ये है कि नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो कभी पानी के लिए हुई हिंसा और अपराध के आंकड़े नहीं जारी करता, अन्यथा आपको पता लगता कि पानी के लिए किस कदर झगड़े मचे हुए हैं। किसानों की आत्महत्या के मूल में कर्ज की बात सामने आती है और किसान कर्ज में प्रायः इसीलिए डूबता है कि पानी के अभाव में खेती चौपट हो जाती है। देश का कोई भी हिस्सा हो, सब तरफ जल संकट मुँह बाये खड़ा है। आपको हैरत होगी यह जानकर कि आजादी के वक्त 1947 में एक लाख से कम गांवों में पेयजल का संकट था और आज यह संख्या 5 लाख तक पहुँच गई है। नौबत ये है कि प्यास से सामूहिक मौतें बचाने के लिए केंद्र सरकार को बुन्देलखण्ड में पानी की ट्रेन भेजनी पड़ती है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के स्थानीय समुदाय के बीच पानी की लूट रोकने के लिए नदियों पर बने बांधों पर गर्मी आते ही पुलिस का पहरा लगाने की परम्परा बन गई है। गंगा-यमुना और सरस्वती के संगम तट पर बसे इलाहाबाद जिले के सैकड़ों गांव जिला प्रसाशन से भेजे जाने वाले पानी के टैंकरों के भरोसे पर हैं। दुनिया के सबसे बड़े संगम तट के निकट काले हिरणों के जंगल में अभी से बूंद बूंद पानी का संकट है। क्या टीवी पर ब्रांडेड पानी की बोतल मुंह में दबाकर लाने वाला वह दृश्य आप हकीकत की दुनिया में देख सकते हैं ? कुलांचे भरते हिरण कब प्यास से छटपटाकर हमेशा के लिए गिर जाएंगे? यह खबर भी किसी को न होगी। जंगल हो, गांव हो या शहर, सभी जगह प्राणी पानी के लिए जूझ रहे हैं। पानी सिर्फ मनुष्य की ही आवश्यकता नहीं, पानी पशु-पक्षियों और अन्य जीवों के जीवन के लिए भी परम आवश्यक तत्व है। दुर्भाग्य कहें या आधिपत्य की आदत, पूरी दुनिया में जल संसाधनों पर अपना-अपना कब्जा जमाने की कोशिशें हो रहीं हैं। पीने लायक पानी के भंडार तेजी से घट रहे हैं। न सिर्फ सतही जल ( नदी, झील-ताल तलैया) बल्कि भूजल और बर्फ के भंडार घटे हैं। भारतीय वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं कि उत्तर भारत का एक्वेफर (भूजल भंडार ) खाली हो रहा है। गंगा और यमुना के तटीय इलाकों के तमाम शहरों में भूजल निकालने पर स्थानीय प्रशासन को रोक लगानी पड़ी है। अनगिनत तालाब सूख चुके हैं, हजारों छोटी नदियां सूख गई हैं और अब गंगा और यमुना जैसी बड़ी नदियों की जलधारा टूटने और सूखने लगी है। इस वक्त गंगा-यमुना का संगम तट रेत के बड़े मैदान में बदला हुआ देखा जा सकता है। गर्मियों में जल की कमी और बारिश में बाढ़ के कहर ने हमारी जल प्रबंधन की योग्यता और हमारी नीयत पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
भारत में आसमान से पर्याप्त पानी बरसता है। यह पानी यूँ ही बेकार बहकर समुद्र में चला जाता है और किसी के काम नहीं आता, न प्राणियों के और न ही पृथ्वी का पेट भरने (रिचार्ज) के। जरूरत है कि बारिश के पानी को रोका जाए और जरूरत पर यही पानी सबके काम आए। मगर ऐसा है नहीं। नदियों का पानी जहां बांध बनाकर रोका भी गया वहां जरूरत पर वो सामान्य जन के काम नहीं आता। बांध का पानी बिजली कंपनियों के लिए बिका हुआ है। पानी साझी सम्पदा है, यह सबके लिए सहज उपलब्ध होना चाहिए है। भारत का सच है कि एक तरफ आलीशान होटलों में लाखों लीटर पानी स्विमिंग पूलों में बर्बाद हो रहा है और दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों में लोग बूंद बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं, पशु- पक्षियों के हक का पानी भी नहीं बच पा रहा।
जल संसाधनों पर कहीं सरकार अपना आधिपत्य दिखाती है, कहीं बाजार और स्थानीय समाज। भारत का सुप्रीम कोर्ट यह तय कर चुका है कि पानी पर किसी एक का मालिकाना हक नहीं हो सकता। न सरकार का, न स्थानीय समाज का। यह साझी सम्पदा है जिसका सदुपयोग होना चाहिए और यह सभी को सहज उपलब्ध रहना चाहिए। मनुष्य, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे… हर तरह के प्राणी मात्र के लिए। सिर्फ प्रबन्धन की ओट में पानी पर कोई आधिपत्य न करे, ऐसा कानून भी है और परम्परा भी। कुदरत से मिली इस धरोहर पर किसी एक का कब्जा कैसे स्वीकार हो सकता है? भारत का समाज आसमान से बरसी जल की बूंदों को सहेजता आया है। समाज के लोग ताल-तलैयों, झीलों और जोहड़ों में बारिश का पानी रोककर न सिर्फ धरती का पेट भरते आये हैं बल्कि सभी के लिए पानी का संचय करते आये हैं। मगर अब कुछ समाज ढीला पड़ा कुछ सरकारें असंवेदनशील होती गईं और पानी बाजार के हवाले हो गया। आज जब पानी की बूंद बूंद का संकट खड़ा है तो उसका समाधान खोजने के लिए हमें अपने समाज की परम्पराओं की तरफ जाना होगा। मानवता के सामने खड़े इस संकट का समाधान भारत की परम्पराओं में है। आज जब बोतलबन्द पानी लिए ऊंट टीवी पर दिखता है तो चेतन मन में आचार्य विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के किस्से स्मृतियों में जिंदा हो जाते हैं। विनोबा ने भुखमरी के शिकार भूमिहीनों के लिए इसी देश में जमीन दान में मांगी थी जिससे भूमिहीन जमीन का टुकड़ा पा सकें और अपने पुरुषार्थ से जमीन में खेती कर सकें। मुश्किलों से लड़ने की साझी पहल भारत की थाती है। इक्कीसवीं सदी का यह साल 2019 उन्हीं ऋषि तुल्य विनोबा भावे को याद करने का खास वर्ष है। इस वर्ष सितम्बर में महाराष्ट्र में जन्में हरिभाऊ विनोबा भावे के जन्म का 125वां वर्ष है। उनको और उनके काम को याद करने, उसी रास्ते पर चलकर समाज और सरकार को जगाने का यह मुबारक मौका है। विनोबा ने 10 लाख एकड़ से ज्यादा जमीन दान में हासिल की। बड़े बड़े जमींदारों को प्रेरित किया कि जमीन दान करें। भारतीय समाज में दान की परम्परा बड़ी गहरी है। कोई भी धर्म हो, जल दान के किस्से हैं। मगर आज की बोतलबन्द पानी इस्तेमाल करने वाली पीढ़ी शायद ही अगली पीढी के लिए कोई ऐसी कहानी बता पाएगी। विनोबा ने एक शताब्दी पहले यह कहते हुए जमीन दान का आह्वान किया था ” सबै जमीन गोपाल की, नहीं किसी की मालिकी…” और लोग भूमि दान के लिए आगे आ गए। आज विनोबा होते तो भारत में पानी का संकट देखकर क्या करते? इसका उत्तर कठिन नहीं है। विनोबा के विचार हमें इस दुष्काल से अच्छे वक्त की ओर ले जा सकता है। गांधी और विनोबा के स्वावलम्बन और साझी सम्पदा के ट्रस्टी बनने का मंत्र हमें न सिर्फ पानी के संकट का सामना करने का रास्ता सुझाता है बल्कि कुदरत के साथ सहअस्तित्व के साथ जीना भी सिखाता है। राज-समाज की साझा कोशिशों के रास्ते पर चलें तो पेड़, पानी और परिंदे सब सुरक्षित रह सकते हैं। विनोबा के रास्ते पर चलने वाले तमाम लोगों ने मिलकर बीते दो दशकों में राजस्थान की सूखी धरती में बारिश के पानी को जोहड़ों में रोककर पूरे इलाके में हरियाली ला दी है, उस इलाके में जहां आसमान से बारिश भी सबसे कम होती है। मगर जहां का समाज सोया है वहाँ जल संकट तेज़ी से बढ़ा है। मसलन उत्तर प्रदेश में जहां बारिश तो खूब है मगर जल संचय कमजोर, वहां पानी के बांधों में पहरे लगाने की नौबत है।
जब देश भूदान आंदोलन के प्रणेता विनायक नरहरि भावे यानी विनोबा भावे का 125 वां जन्मदिन समारोह मनाने की तैयारी में है, तब हमें भारतीय परम्पराओं में जाकर ही पानी की समस्या का समाधान खोजना चाहिए। विनोबा 11 सितम्बर 1895 में महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में जन्में और 7 जून 1916 को महात्मा गांधी से मिलने के बाद वह भूमिहीनों की मदद के लिए जनसहयोग मांगने निकले पड़े थे। ऐसे में इस देश की संस्कृति को जानने और मानने की आवश्यकता है। विकास के जो भी मॉडल हमने अब तक इस्तेमाल किये हैं, उन रास्तों ने जल और जंगल से हमारी दूरी ही बढ़ाई है। जिस आजाद भारत में हमारे लीडरों ने कभी दूध की नदियां बहाने का दावा किया था वहां अब नदियां सूख रहीं हैं। दूध की नदियां यहां पशुधन से था-श्वेत क्रांति से। मगर बिना जल सब सून… क्या पशु, क्या पक्षी। इस वक्त तमाम इलाकों में बूंद बूंद पानी का संकट है। समाज के लिए सहज उपलब्ध होने वाला पानी बाजार के हवाले हो गया है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में तो काजू के जंगल से गुजरी नदी तक ठेकेदारों के हवाले हो गई। हमारी परंपरा है कि पानी पिलाने को हम पुण्य का काम मानते आए हैं। प्यासे से ज्यादा तृप्ति पानी पिलाने वाला महसूस करता रहा है। यह वही देश है जिसका समाज पौशाले खुलवाता था आदमी और जानवरों-पक्षियों के लिए भी। लोग गर्मी में शरबत के सबीले लगाते रहे हैं… भारत समृद्ध जल संस्कृति वाला देश हैं। यहां व्यापार भी शुभ लाभ की तमन्नाओं के साथ होता रहा है। मगर अब यह देश और समाज कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिटीली के आधुनिक दौर में जा पहुचा हैं जहां पानी का दाम बाजार में दूध के दाम से कहीं ज्यादा है। जल दान और तालाबों के लिए श्रमदान करने वाले देश का मौजूदा समाज भले गीत यही गाता हो कि ” हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है।” मगर यहाँ नदियां सूखी हैं और उनके साथ सांस्कृतिक सूखा भी है। हालत ये हैं कि देश को खुशहाल बनाने के दावे भले लगातार लिए जाएं मगर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र खुशहाली के इंडेस्क ( इंडेस्क आफ हैपीनेस) में दुनिया के तमाम देशों की लिस्ट में बहुत नीचे खिसक आया है। फिलवक्त देश आम चुनावों के प्रक्रिया से गुजर रहा है। लोकतंत्र के इस उत्सव में करोड़ों युवा पहली बार मतदान करेंगे। यह उत्सव अनूठा है। सियासी दल नये स्वप्न लेकर आये हैं। उन स्वप्नों को पूरा करने के वायदे करने और दोहराने का क्रम चल रहा है, पर भोजन का अधिकार देने का ऐलान कर चुकी भारत की संसद में जाने को आतुर लोगों ने इस चुनावी उत्सव में पानी को बिसरा दिया है। उत्सव जल के बिना कभी पूरे हुए हैं क्या? विनोबा होते तो शायद कह देते कि सियासी लोगों की आंख का पानी मर गया है, इसलिए लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव में पानी पर कोई बहस नहीं हुई। पर भारत में समाज की सक्रियता पूरी तरह ठप नहीं हुई है। पूरे देश में छोटे छोटे स्वरूप में जल संसाधनों को सहेजने और उनका सदुपयोग करने की कोशिशें भी आकार ले रही हैं। अकेले राजस्थान के समाज ने पिछले दो तीन दशकों में 50 हजार से ज्यादा बड़े जोहड़ और तालाब बनाये हैं। दशकों तक सूखी पड़ी रहीं छोटी- छोटी 9 नदियों को फिर से बारिश का पानी रोककर प्रवाहित कर दिया है। यह समाज की साझा कोशिशों के परिणाम है कि सरिस्का के जंगल में फिर से मंगल गान गूंजे हैं। पंजाब, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार में या यूं कहें कि गंगोत्री से गंगा सागर तक और कश्मीर से सिक्किम तक छोटी छोटी जल संरचनाओं के निर्माण, उनसें बारिश के जल संचयन के जनभागीदारी वाले काम शुरू हुए हैं। विनोबा की 125 वीं सालगिरह के दौरान एक बार फिर से विनोबा के जनभागीदारी के कार्यों को तेजी से बढाने का संकल्प लिया गया है। विनोबा के बताए रास्ते पर चलने वाले देश के सैकड़ों संगठनों ने एक साथ मिलकर रचनात्मक कार्यों को आगे बढाने और पूरे देश मे जल संरक्षण का सन्देश देने की तैयारी की है। विनोबा का जन्म दिवस समारोह इस भावना को आगे बढ़ाने का जरिया बनेगा। स्वयं सेवकों ने महात्मा गांधी के वंशजों की मौजूदगी में अलवर के तरुण भारत संघ के आश्रम में एकत्र होकर पानी की साझी लड़ाई को आगे बढाने का संकल्प दोहराया है। विनोबा का मंत्र था ” सबै भूमि गोपाल की, नहीं किसी की मलिकी… ” और अब इन स्वयं सेवकों ने समवेत स्वर में आह्वान किया है कि ” सबै पानी गोपाल का…” अगर देश की सरकारों ने भी इस स्वर में अपना स्वर मिलाया तो एक बेहतर कल की भूमिका लिखी जा सकती है।

लेखक
ब्रजेंद्र प्रताप सिंह
(वरिष्ठ पत्रकार/ राष्ट्रीय संयोजक: छोटी नदियां बचाओ अभियान)ै पानी गोपाल का..
ब्रजेंद्र प्रताप सिंह
(वरिष्ठ पत्रकार/ राष्ट्रीय संयोजक: छोटी नदियां बचाओ अभियान)

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