उत्तराखण्ड में सियासत का जिस जरह से खेल चल रहा है उसे देखकर मुझे कहने में जरा सा भी संकोच नहीं है कि यहां पर नेताओं की जमात किसी नौसिखियों से कम नहीे है। 19 साल के किशोर हो चुके में कई ऐसे वाक्ये हुये जिन्हें देखकर लगता है कि वाकई उत्तराखण्ड के नेताओं में मैच्युरिटी की बहुत बड़ी कमी है। कुछ ऐसे नेता भी हैं जो अपने कारनामों से हमेशा सुर्खियों में बने रहते हैं। ये ही बात है कि उत्तराखण्ड प्रदेश को ऐसे सियासी कलाकार मिले जिन्होंने उत्तराखण्ड को समय से पहले ही बुजुर्ग बना दिया। आज जब देश इककीसवीं सदी में प्रवेश कर रहा है तो वहीं पर ये सियासत दार जनता को धर्म और जाति में बांटकर उनके अन्दर द्वेष और उन्माद फैलाकर सियासी रोटियां सेंकने में मशगूल है। अफसोस विकास धरातल पर कम और कागजों में ज्यादा नज़र आ रहा है। जबकि धार्मिक उन्माद की लहर धरातल पर ज्यादा नजर आ रही है जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव संपन्न हुये भाजपा शासित प्रदेशों में धार्मिक उन्माद की चिन्गारी धधकने लगी जो दंगों का रूप भी ले सकती है।

बिहार और बंगाल इसका जीता जागता उदाहरण हैं उसमें सबसे बड़ा हाथ उन नेताओं का होता है जिनका काम सिर्फ और सिर्फ समुदायों को आपस में बांटना होता है और उन्हें ही प्रथम पंक्ति के नेता होने का गौरव हासिल होता है।जो काम करने से ज्यादा भड़काऊ बोलने में यकीन रखते हैं। ऐसे ही अनर्गल बयानबाजी से हमारी देवभूमि उत्तराखण्ड में भी कुछ नेता हैं जो हमेशा सुर्खियों में बने रहते हैं।लेकिन यहां पर थोड़ा सा फर्क है। यहां अभी ऐसा कुछ भी नहीं है लेकिन फिर भी तरीके पर गौर करिये आइये ऐसे उत्तराखण्ड के कुछ नेताओं के बारे में बताते है जो कहीं न कहीं अपने कारनामों से सुर्खियों में बने रहते है। नेता नम्बर एक— ये दिखने में तो सुडौल जिस्म के होने के साथ रजवाड़े से ताल्लुक भी रखतें हैं ऐ अपने आगे किसी को भी समझना नहीं चाहते कभी जश्न के दौरान फायरिंग तो कभी रिर्टनिंग आफिसर के कमरे में किसी नेता के नामांकन के दौरान बेधड़क सुरक्षा गार्डों के साथ अन्दर प्रवेश कर जाते है। वैसे दल बदलने में भी इन्हें परहेज नही है। नेता नम्बर दो— ये भी मौजूदा सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर है इनकी हनक न तो पहले कम थी और न अब कम है। श्ष्टिाचार में अव्वल हैं लेकिन कई प्रकरणों से सुर्खियों में भी रहे जिसके चलते इन्हें अपनी कुर्सी से भी हाथ धोना पड़ा था।

वर्तमान में भी उनके मंत्रालय से कर्मचारीयों को हिदायत दी जाती रही है ऐसे हालात में जब डाक्टरों की कमी से प्रदेश जूझ रहा हो डाक्टर को ही मंत्रालय से धमकी दी जा रही हो आखिर किसके इशारे पर जो एक गम्भीर सवाल है। नेता नम्बर तीन—ये भी बड़बोले नेताओ में गिने जाते है पहले जब ये प्रदेश मे अपने बड़बोलेपन की वजह से चर्चाओं में थे, वर्तमान सरकार में भी इनके पास अहम विभाग है इन्हें कुछ भी कहने में हिचक नहीं है यें जनता दरबार में पहुंचने वालों से कहते हैं कि कोई ज़हर की पुड़िया लेकर तो नहीं आया। अब आप खुद बतायें जनता की मुफलिसी का मज़ाक उड़ाने का इससे बड़ा और क्या सबूत होगा। देश में आज जिस तरह के हालात पैदा हो रहे हैं उसके संकेत पूर्व में महसूस किये जा रहे थे लेकिन जो वर्तमान हालात चल रहे हैं वो सवच्छ राजनीति का द्योतक नही है। मेक इन इंडिया का आईना दिखाने वाले लोगों ने इंडिया को क्या दिया ये रिपोर्ट बताती हैं कुपोषण में भारत हरियाली में भारत पिछड़ा गरीबी में भारत अग्रिम पंक्ति में भ्रष्ट देशों में भारत अपनी भागीदारी रखता हो फिर ऐसे में हम जश्न मनायें कि हम इक्कीसवी सदी में जा रहे हैं। देश में नोटबन्दी जी एस टी ने कमर तोड़ कर रख दी कारोबारी आत्म हत्या कर रहे हैं कृषि प्रधान देश का गौरव हासिल करने वाले भारत में किसाान आत्म हत्या कर रहे हों किसान का कर्जा तो माफ नहीं हुआ नेताओं के कर्जे माफ हो रहे हैं ।

जिस देश में अस्पताल में मरीज को बर्तन के अभाव में खाना जमीन पर परोसा दिया जाता हो जिस प्रदेश में शवों को ठेले और रिक्शों में तीमारदार ढ़ोने के लिये मजबूर हो वहां पर राम की लड़ाई लड़ी जा रही हो मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम ने असुरों दानवों को मारने के लिये अवतार लिया था। देश में नारी सुरक्षित नहीं चाहें गर्भ में हो या सड़कों पर उस पे गर्व के साथ बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओ का श्लोगन दिया जा रहा हों । मंहगाई ने गरीब के मुह से निबाला छीन लिया और हम गरीबी दूर करने का नाटक करते हैं डिजीटल इंडिया की बात करते हैं और मीडिया की आजादी पर पहरा बैठा देते है। प्राईवेट स्कूलों और मेडिकल कालेजों की मनमानी फीस बढ़ोत्तरी में सरकार खुद जनता का हित भूलकर निवेशकों की हमराही हो जाये। प्रदेश को लूट खसोट कर वैन्टीलेटर पर पहुंचा दिया । देश में कभी जाट कभी गुर्जर तो कभी दलित सड़कों पर उतरकर सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहंचा ही रहे हैं साथ ही हाथों में खुले आम हथियार लहराकर सरकार की नाकामी को धता बता कर कत्ले आम कर रहे हों और सियासी दल अपनी रोटियां सेंकने में मशगूल हो जाये क्या यही स्वस्थ लोकतंत्र और स्वच्छ लोकतंत्र का परिचायक है। छदम्य राजनीति के जरिये लोक तंत्र का गला घोंटा जा रहा है। कितने अफसोस की बात है कि विधायिका न्यायपालिका पर हावी हो गई है अब तो न्यायधीश भी फ्रस्ट्रेट होकर टेंशन में हैं तो अब समझ लीजिए लोकतंत्र कृतिम जीवन रक्षा प्रणाली पर है

सलीम रज़ा

देहरादून उत्तराखंड

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