73 वें आज़ादी के जश्न में हम गुलामी का बिगुल बजायेंगे कुल जनसंख्या के 2% पूंजीपति इस देश को अपना गुलाम बना विकसित भारत का सपना दिखाएंगे ।हम विश्व गुरु का डंका बजा बेरोजगारों की संगत में बैठा कर मंजीरा और ढोलक बजायेंगे ।

मुकेश अंबानी हमेशा से सत्ता का सहयोग चाहते थे कोई भी सरकार जनता के साथ-साथ उद्योगों एवं उद्योगपतियों की भी सहायक होती है, जिसका लाभ देश और जनता को भी मिलता रहता है। लेकिन मुकेश अंबानी देश के अंदर ऐसी सत्ता चाहते थे, जो सिर्फ और सिर्फ उनके लिए काम करे दूसरे अर्थों में कह सकते हैं उनके इशारे पर काम करे या फिर यह कह सकते हैं कि सत्ता की चाबी मुकेश अंबानी अपने हाथों में रखना चाहते थे।

कांग्रेसनीत यूपीए के राज में मुकेश अंबानी ऐसा नहीं कर पाए, लेकिन मोदी की तरफ से मुकेश अंबानी को एक तरह से खुली छूट शुरू से ही दी गई है। आपको याद होगा, 2014 में मोदी सरकार बनने के 4 महीने से भी कम समय में भारतीय रेलवे की डीजल सप्लाई इंडियल ऑयल से छीनकर बिना किसी टेंडर के मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्री को दे दी गई थी।

इस आधार पर कह सकते हैं कि नरेंद्र मोदी जी जब 2014 में प्रधानमंत्री बने थे, उसमें मुकेश अंबानी का बहुत बड़ा हाथ था। प्रचार तंत्र से लेकर चुनाव में लगने वाले पैसे तक में मुकेश अंबानी ने सहयोग किया था. यह बातें कई लोग मान रहे हैं जिस तरीके की छूट मुकेश अंबानी को मोदी सरकार ने दी है, उससे भी मोदी सरकार और मुकेश अंबानी की साठगांठ पर लगने वाले आरोप कहीं ना कहीं सही लगते हैं।

मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज की वार्षिक आम बैठक अभी आज ही में खत्म हुई है.
रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने कंपनी के शेयरधारकों को इस ख़त्म हुई बैठक में अधिक लाभांश और बोनस देने का वादा किया है. मुकेश अंबानी ने इसके साथ ही एक और वादा किया है, उनका कहना है कि अगले 18 महीने में यानी 31 मार्च 2021 तक रिलायंस इंडस्ट्रीज को कर्ज़ मुक्त बना दिया जाएगा।

रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी के अनुसार पिछले साल रिलायंस रिटेल ने हर 4 सेकंड में एक टीवी और उसी दौरान हर 2 सेकंड में एक फोन बेचा है।मुकेश अंबानी ने बताया कि आज रिलायंस रिटेल दुनिया के 100 टॉप रिटेलर्स में जगह बनाने वाली अकेली भारतीय रिटेलिंग कंपनी है और मुकेश अंबानी का लक्ष्य अगले 5 वर्षों में दुनिया के टॉप 20 रिटेलर्स में शामिल होने का है।

रिलायंस और सऊदी अरब की कंपनी अरामको के बीच सबसे बड़ी एफडीआई डील हुई है! मुकेश अंबानी के अनुसार Oil-to-Chem biz मैं सऊदी अरामको भी निवेश करेगी. इसके तहत अरामको 75 बिलियन डॉलर के भारी भरकम निवेश से रिलायंस इंडस्ट्री लिमिटेड में 20% की हिस्सेदारी लेगी।

यहां ये भी बताना अनिवार्य है की प्रधानमंत्री मोदी के सऊदी अरब दौरे पर ये डील इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन और अरामको के बीच फाइनल हुई थी, जो सऊदी के शेख के भारत दौरे के समय नाटकीय रुप से इंडियन ऑयल के हाथों से निकल कर रिलायंस इंडस्ट्री के पास चली गई।

गौरतलब़ बात यह है कि जनता को भी कहीं ना कहीं मुकेश अंबानी से जोड़ा जा रहा है ।जनता के द्वारा इस्तेमाल हो रही हर चीज मुकेश अंबानी या उनकी कंपनी से संबंध रख रही है। एक तरह से देखा जाए तो पहले देश अंग्रेजो का गुलाम था! ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश को 200 साल तक गुलाम रखा।ब्रिटिश कंपनी और ब्रिटिश सरकार से देश को आजाद कराने के लिए देश के कई क्रांतिकारियों ने अपनी जान की आहुति दे दी, फांसी के फंदे को चूमा, कांग्रेसियों ने कई साल सलाखों के पीछे बिताए, कई आंदोलन किये, जिसे ब्रिटिश सरकार ने कुचलने का भी काम किया, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और ब्रिटिश हुकूमत से देश को आज़ाद कराया।
आज अगर देखा जाए तो ईस्ट इंडिया कंपनी की जगह रिलायंस इंडस्ट्रीज ले रही है और देश को भाजपा सरकार मुकेश अंबानी के हवाले कर रही है. जिस में सबसे बड़ा रोल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वर्तमान गृहमंत्री अमित शाह का है।

रिलायंस एजीएम में मुकेश अंबानी ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के क्षेत्र में भी बहुत जल्द निवेश करने की बात कही है।मुकेश अंबानी की बातों से यह बल और मज़बूत हो रहा है कि धारा 370 हटाने के पीछे कहीं ना कहीं मुकेश अंबानी की व्यापारिक नज़र थी कश्मीर और लद्दाख पर और मुकेश अंबानी के इशारों पर ही भाजपा ने अपने पुराने एजेंडे पर काम करते हुए धारा 370 को हटाया है. क्योंकि कश्मीर की समस्या धारा 370 नहीं बल्कि कश्मीर की समस्या आतंकवाद थी!
जिस तरीके से भारतीय मीडिया में प्रचार किया जा रहा है कि कश्मीर पिछड़ा हुआ था, वह बिल्कुल भी सही नहीं है। कश्मीर कई मामलों में आज गुजरात से भी आगे है कश्मीर की इकॉनमी भी कई मामलों में दूसरे राज्यों से आगे है।

कांग्रेस के साथ-साथ देश में जो अन्य सरकारें रही हैं और जो इस समय भाजपा की सरकार है उनमें बस यही फ़र्क रहा है कि… हर सरकार ने पूंजीपतियों का ध्यान रखा है लेकिन पूंजीपतियों का ख़्याल इसी शर्त में रखा है कि पूंजीपति जनता की सुविधाओं का ध्यान रखें और पूंजीपति ही सरकार ना चलाने लग जांए।लेकिन आज भाजपा की सरकार में चेहरा सिर्फ एक है मोदी लेकिन उसके पीछे देश चलाने वाला चेहरा अगर कोई नजर आ रहा है तो वह है मुकेश अंबानी।

देश की जनता को कहीं ना कहीं मानसिक तौर पर गुलाम बनाने की कोशिश हो रही है। पहले जियो के द्वारा फ्री सिम और डाटा देकर युवाओं को बेरोज़गार बनाकर खुद के लिए प्रचार करवाया।जिसका नतीजा यह है कि आज युवा काम से ज्यादा सोशल मीडिया पर समय बिताकर भाजपा का प्रचार कर रहे है! वो भी बिना तथ्यों और वास्तविकता के ज्ञान के.उसकी जानकारी का आधार व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी का झूठा सिलेबस है।

रिलायंस इंडस्ट्रीज की वार्षिक बैठक में जो प्रमुख लक्ष्य रखा गया है, उसमें जियो फ़ाइबर का कमर्शियल लांच 5 सितंबर को होने वाला बताया गया है।इसके ब्रॉडबैंड की कीमत ₹700 से लेकर ₹10000 तक होगी! सेट टॉप बॉक्स में मिलेगा वर्चुअल रियलिटी का सपोर्ट, टीवी पर ही होगी शॉपिंग।जियो स्मार्ट टीवी पर मिलेगी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा, ब्रॉडबैंड के साथ फ्री मिलेगा लैंडलाइन का फोन। कोई भी फिल्म रिलीज के दिन ही प्रीमीयम ग्राहकों के लिए टीवी पर देखने का मौका अवसर रहेगा।अमेरिका और कनाडा में ₹500 महीने का प्लान में अनलिमिटेड कॉलिंग कर सकेंगे. ऐसी बहुत सी लोकलुभावन बातों के बारे में मुकेश अंबानी द्वारा जानकारी दी गई है।

यहां बात जनता को दी जा रही सुविधाओं की नहीं है बात यहां ये है कि क्या सरकार सिर्फ एक उद्योगपति के लिए ही काम करेगी? उसके हाथों का खिलौना ही बनकर रह जाएगी?
या उसका जनता के प्रति भी कोई जिम्मेदारी है? क्या मुकेश अंबानी जैसे लोग सरकार चलाएंगे? सरकार को अपने हाथों का खिलौना बना कर रखेंगे? देश के अंदर कोई उद्योगपति अच्छा कर रहा है यह बहुत ही अच्छी बात है, लेकिन क्या जनता तरक्की करे इस पर विचार नहीं किया जाएगा?

जनता को सुविधाओं के नाम पर सिर्फ एक उद्योगपति को ही देश में आगे बढ़ने का मौका मिलेगा?
क्या जनता ने इस सरकार को इसलिए अपना कीमती वोट दिया है, ताकि यह सरकार मुकेश अंबानी जैसे उद्योगपतियों को ही आगे बढ़ाती रहे? या देश चलाने के लिए देश के अंदर नीतियां बनाने के लिए उद्योगपतियों का सहारा ले? या जो उद्योगपति चाहे वैसी ही नीतियां बनाएं?

आज हिंदुस्तान की आधी से ज्यादा आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जिसको इस रिलायंस की फ़ाइबर से, फिल्म रिलीज वाले दिन देखने से, अमेरिका-कनाडा कॉलिंग से, या अन्य जो भी सुविधाएं रिलायंस देने का वादा कर रही है, उससे ग्रामीण आबादी को कोई लेना-देना नहीं है ।गुलाम भारत जब आजाद हुआ था उस समय गरीबी का अनुपात क्या था और आज क्या है? इससे यह पता चलता है कि 70 सालों में या यूं कहें कि 2014 से पहले जो भी सरकारें रही हैं… उन्होंने ग्रामीण जनता के हितों को हमेशा सर्वोपरि रखा है और गरीबी के अनुपात में अंतर आया है

आज देश के अंदर अमीर और गरीब के बीच का फ़ासला हद से ज्यादा दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। उसी फैसले को कम करने की बहस छिड़ी हुई है! लोग बात कर रहे हैं कि अमीर और गरीब के अंतर को किस तरीके से कम किया जाए, लेकिन भाजपा सरकार लगातार अमीर और गरीब के अनुपात पर ध्यान देने की जगह अमीरों एवं उद्योगपतियों का समर्थन करके गरीबों को और पीछे धकेलती जा रही है ।आज यह सरकार सिर्फ भाषण और प्रचार के दम पर चल रही है. गरीबों के लिए सिर्फ इस सरकार के पास जुमले हैं और उन जुमलों का प्रचार मीडिया भी खूब कर रही है।
जुमलों के अलावा इस सरकार ने गरीबों को कुछ भी नहीं दियहै ।गरीबों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं, सड़कें हर सरकार ने दिया है! यह सामूहिक सुविधाएं होती है।इनसे इतर मोदी सरकार ने शौचालय का खूब प्रचार किया जगह-जगह शौचालय बनाए भी.लेकिन आज यह शौचालय इस्तेमाल करने लायक ही नहीं हैं।

मोदी सरकार ने गरीबों को गैस सिलेंडर देने का काम किया था, लेकिन एक बार इस्तेमाल करने के बाद आज वह गरीब अपने खाली सिलेंडर को दोबारा भरवाने गया या नहीं उस पर ना ही सरकार ने ध्यान दिया, ना ही इस देश की मीडिया ने ध्यान दिया. जब गरीब के पास पैसा ही नहीं होगा, उसकी तरक्की होगी ही नहीं तो फिर गरीब तो चूल्हे पर ही खाना बनाएगा! गरीब दोबारा सिलेंडर भरवा सके, जरूरत उसकी आर्थिक स्थिति में इतना सुधार करने की है. गरीबों को रोजगार मिल सके, पैसा कमाने का जरिया मिल सके, इसके लिए आखिर सरकार ने क्या किया है?

यह सरकार लगातार उद्योगपतियों के लिए नीतियां बनाते जा रही है… या यूं कहें कि उद्योगपति ही अपने लिए नीतियां बना रहे हैं, जिनको ये सरकार अमलीजामा पहना रही है।

मोदी सरकार और खुद प्रधानमंत्री मोदी हर मंच से विकास की बात करते हैं! विकास का मतलब होता है अगर किसी परिवार की आमदनी ₹200 प्रतिदिन है तो वह बढ़कर ₹400 या ₹500 प्रति दिन में आए।क्या इस सरकार में ऐसा हुआ? अगर ऐसा नहीं हुआ है तो फिर प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के तमाम नेता कौन से विकास की बात करते हैं? हिंदुस्तान की मीडिया कौन से विकास की बात कर रही है?

जब जनता का खुद के परिवार के अंदर आर्थिक विकास नहीं होगा तो फिर बाकी के विकास की बातें करना बेईमानी है। सामूहिक इस्तेमाल की सुविधाएं तो हर सरकार देती है! ये उसका कर्तव्य होता है और यह सरकार भी मजबूरी में कहीं ना कहीं थोड़ी मात्रा में वह काम कर रही है, जिसको बड़े मात्रा में प्रचारित किया जा रहा है. लेकिन इस सरकार के मूल में अगर देखा जाए तो सिर्फ और सिर्फ इस देश के उद्योगपति हैं और उनमें भी मुकेश अंबानी सबसे अग्रणी रूप में है।
यह सरकार या यूं कहें कि मुकेश अंबानी खुद के लिए ही नीतियां बना रहे हैं और खुद ही देश चला रहे हैं।क्या देश का नागरिक यह देख रहा है कि इस देश के उद्योगपति या फिर मुकेश अंबानी के ऊपर जितना टैक्स लगता है वह पूरा टैक्स दे रहे हैं या नहीं? या उनको सरकार की तरफ से पूरी छूट मिल जा रही है?

गरीब जनता और मिडिल क्लास से यह सरकार जबरदस्ती टैक्स पर टैक्स लगाकर उसको वसूल रही है।वहीं उद्योगपतियों और बड़े-बड़े रामदेव जैसे व्यापारियों को टेक्स में लगातार छूट दे रही ह।यह तो सरासर देश के साथ धोखा हुजिस तरीके से ईस्ट इंडिया कंपनी ने शुरुआत लोगों को देने से की थी, बाद में ब्रिटिश ने हिंदुस्तान को गुलाम बना लिया था.ठीक उसी तरीके की शुरुआत या यूं कहें कि उसी तरीके का लक्ष्य मुकेश अंबानी ने भी रखा है, वो भी इस मोदी सरकार के दम पर।

ये स्थापित तथ्य है कि जब तक इस देश की आधी आबादी जहां रहती है, यानी गांव का विकास नहीं होगा, उनकी आमदनी में बढ़ोतरी नहीं होगी, तब तक यह देश तरक्की नहीं कर सकता।।लेकिन यह सरकार ग्रामीण इलाकों में या आदिवासी इलाकों में रह रहे गरीब परिवारों की आर्थिक हालत सुधारने के लिए, उनके लिए रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए कुछ भी नहीं कर रही है।

मुकेश अंबानी का कहना है कि मैं प्रधानमंत्री मोदी के 2024 हिंदुस्तान के 5 ट्रिलियन इकोनामी का समर्थन करता हूं और मेरा मानना है कि 2030 तक हिंदुस्तान 10 ट्रिलियन इकोनामी होगा!
आखिर भाजपा सरकार या प्रधानमंत्री मोदी या मुकेश अंबानी जिस अर्थव्यवस्था की बात कर रहे हैं, वह अर्थव्यवस्था किसकी होगी? क्या ऊपरी दिखावे से गरीब का पेट भरेगा? अगर गांव के अंदर रह रहे गरीबों कि अपनी खुद की कमाई में बढ़ोतरी नहीं होगी, उनको रोज़गार के अवसर गांव में नहीं दिए जाएंगे तो फिर इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था का क्या फायदा? अर्थव्यवस्था दो-चार लोगों के लिए अगर तैयार होती है तो हिंदुस्तान की जनता का इसमें क्या फायदा?

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