
सरदार पटेल और संघ: देश की एकता को लेकर उनकी चिंता और विरोधस्वतंत्र भारत के इतिहास में सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम दृढ़ इच्छाशक्ति, प्रशासनिक क्षमता और राष्ट्र की एकता के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। उन्होंने जहां 563 रियासतों को भारत में विलय कर “अखंड भारत” की नींव रखी, वहीं उन्होंने यह भी सुनिश्चित करने की कोशिश की कि कोई भी संगठन या विचारधारा देश की एकता और संविधान के ऊपर न हो।इसी संदर्भ में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की गतिविधियाँ कई बार उनके लिए चिंता का विषय बनीं।देशभक्ति से राष्ट्रविरोध ताकतों : पटेल की नज़र में संघ।आज़ादी के शुरुआती वर्षों में सरदार पटेल RSS के प्रति पूरी तरह विरोधी नहीं थे।
वे मानते थे कि संगठन के भीतर देशभक्त लोग हैं, जो हिंदू समाज के उत्थान के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें यह अहसास हुआ कि यह संगठन अपने तरीके से देश की एकता और साम्प्रदायिक सौहार्द को कमजोर कर रहा है।गांधीजी की हत्या के बाद बढ़ी नाराज़गी30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद, देशभर में तनाव और गुस्से की लहर फैल गई। गृह मंत्री के रूप में सरदार पटेल के पास अनेक रिपोर्टें पहुँचीं कि RSS के कुछ सदस्य इस घटना के बाद खुशी मनाते दिखाई दिए।इससे वे बेहद व्यथित हुए।
उन्होंने एक पत्र में लिखा था कि“RSS के प्रचार और भाषणों ने लोगों के मन में ऐसा विष भर दिया है, जिससे राष्ट्र की एकता और शांति को गंभीर चोट पहुँची है।”पटेल का मानना था कि गांधीजी की हत्या किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस विचारधारा की परिणति थी जो नफरत और विभाजन को बढ़ावा दे रही थी।
संघ पर प्रतिबंध: राज्य की एकता की रक्षागांधीजी की हत्या के तुरंत बाद फरवरी 1948 में सरकार ने RSS पर प्रतिबंध लगा दिया।यह निर्णय स्वयं सरदार पटेल की सहमति और गृह मंत्रालय की रिपोर्ट पर आधारित था।उनका तर्क था कि RSS की गतिविधियाँ न केवल “राज्य की सुरक्षा” बल्कि “लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था” के लिए भी खतरा बन गई हैं।उन्होंने साफ कहा था:“RSS की गतिविधियाँ सरकार और राज्य के अस्तित्व के लिए प्रत्यक्ष खतरा हैं।”पटेल का यह कदम केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि एक गहरी राष्ट्रीय चिंता से प्रेरित था
— कि नवगठित भारत में कोई भी संगठन हथियारबंद या वैचारिक विद्रोह की राह पर न चले।राष्ट्र और संगठन के बीच संतुलन का संदेशपटेल ने संघ के नेताओं को यह भी समझाने की कोशिश की थी कि यदि वे वास्तव में राष्ट्रसेवा करना चाहते हैं, तो संविधान और कानून के दायरे में रहकर करें। उन्होंने कहा था—“हिंदुओं को संगठित करना गलत नहीं है, परंतु निर्दोषों से बदला लेने या समाज में भय फैलाने का अधिकार किसी को नहीं है।”
यही वह दृष्टिकोण था जो बताता है कि पटेल का विरोध RSS से नहीं, बल्कि उसकी कार्यशैली से था — जब वह राष्ट्रीय एकता के मार्ग से भटकने लगा।इतिहास की गवाही:आज जब RSS खुद को “राष्ट्रनिर्माण” का वाहक बताता है, तो इतिहास में दर्ज यह तथ्य याद दिलाते हैं कि भारत के लौहपुरुष ने इस संगठन की कार्यपद्धति को राष्ट्रविरोधी और असंवैधानिक माना था।उनकी दृष्टि में, भारत का राष्ट्र “धर्म” या “संगठन” से नहीं, बल्कि संविधान और समानता से परिभाषित होता है।सरदार वल्लभभाई पटेल न तो किसी समुदाय के विरोधी थे, न किसी धर्म के।वे केवल उस विचारधारा के विरोधी थे जो देश की एकता, शांति और संविधान से ऊपर खुद को मानती थी।RSS की गतिविधियों ने उन्हें विचलित इसलिए किया क्योंकि वे उस भारत के सपने के विपरीत थीं, जहाँ हर नागरिक को समान अधिकार और सुरक्षा मिले।आज, जब राजनीति में “राष्ट्रवाद” की बातें बार-बार दोहराई जाती हैं, तब सरदार पटेल का यह दृष्टिकोण याद रखना ज़रूरी है —“राष्ट्र किसी संगठन से नहीं, उसकी एकता और संविधान से बनता है।”
RSS एक संवैधानिक बिना पंजीकृत संगठन है उनके करे गलत कार्यों गतिविधियों की जिम्मेदारी किसी “एक या दो या तीन इंसान व्यक्तिगत पर ही आएगी – मालेगांव” संगठन बना रहेगा साजिश करने को “देशभक्ति के नाम पर जब संगठन राज्य के कानून और संविधान से ऊपर खड़ा होने लगे, तो वह देश के लिए खतरा बन जाता है।
” सरदार बल्लव भाई पटेल कोटि कोटि नमन है लौह पुरुष को उनके भारत को एक सूत्र में पिरोने के लिए “जय सरदार “
संपादक रूद्र

