
कांग्रेस के 60 वर्षों के शासन में विपक्ष की राजनीति: जनसंघ से बीजेपी तक सड़क से संसद तक चला संघर्ष यह नाम बदल कर कांग्रेस शासन में विरोध करते रहे ।*आज विपक्ष निष्क्रिय है कांग्रेस किसी भी सरकारी गलत नीति का विरोध नहीं कर पा रही । राज्य स्तर की राजनीतिक पार्टियां कुएं के मेढक की तरह टर टर कर बरसात (चुनाव) का इंतजार कर रही हैं। देश और देशवासी ठगे जा रहे देश कर्जदार विकास की राह पर अग्रसर है गरीब गरीब होता जा रहा माध्यम वर्ग बैंकों का कर्जदार और अमीर अमीर होता जा रहा ।स्वतंत्र भारत की राजनीति में कांग्रेस ने लगभग छह दशकों तक सत्ता का केंद्र संभाला। इस लंबे दौर में विपक्ष ने कई रूप बदले—कभी जनसंघ के रूप में, कभी जनता पार्टी के रूप में, और अंततः भारतीय जनता पार्टी के रूप में। लेकिन एक बात स्थिर रही—कांग्रेस की नीतियों, निर्णयों और शासनशैली के खिलाफ लगातार विरोध, आंदोलन और राजनीतिक संघर्ष।1. जनसंघ का जन्म और वैचारिक विरोध (1951–1977)डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा स्थापित भारतीय जनसंघ ने अपने शुरुआती दौर से ही कांग्रेस के केंद्रीयकृत शासन के खिलाफ वैचारिक लड़ाई शुरू कर दी थी।कश्मीर मुद्दा जनसंघ की राजनीति का मुख्य आधार बना।चीन के प्रति कांग्रेस की नीति पर 1962 के युद्ध के बाद विपक्ष ने जमकर हमला बोला। *चीन भारत में घुसपैठ कर रहा है आज सत्ता आसीन सरकार कुछ नहीं कर पा रही ।1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा पर जनसंघ ने कांग्रेस को घेरने की कोशिश की।*बीजेपी सत्ता आसीन सरकार 11 साल में पांच आतंकी हमले पाकिस्तान ने करवाए 1000 सेना के अधिकारी जवान नागरिक शहीद हुए ।1960–70 के दशक में गोहत्या विरोध आंदोलन, शिक्षा नीति, और बढ़ती सरकारी दखलंदाजी के खिलाफ प्रदर्शन हुए।*आज ग्यारह साल बीजेपी सत्ता आसीन भारत बीफ निर्यात में विश्व का तीसरे नंबर पर पहले नंबर पर आने के लिए गाय भैंस काटी जा रही है ।कांग्रेस के मुकाबले जनसंघ उस दौर में अपेक्षाकृत छोटा दल था, लेकिन उसके विरोध ने कांग्रेस के ‘अप्रतिद्वंद्वी’ शासन को लगातार चुनौती दी।2. आपातकाल और विपक्ष का संगठित विद्रोह (1975–1977)इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपातकाल विपक्ष के इतिहास में सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।नेताओं की गिरफ्तारी, प्रेस पर सेंसरशिप, और नागरिक अधिकारों पर रोक के खिलाफ पूरे देश में असंतोष फैला।भूमिगत आंदोलन, गुप्त सभाएँ और सामाजिक संगठनों ने कांग्रेस सरकार का खुलकर विरोध किया।यही वह समय था जिसने विपक्ष को एकजुट किया और जनता पार्टी के रूप में 1977 में कांग्रेस को पहली बार सत्ता से बाहर कर दिया। यह भारतीय लोकतंत्र में विरोध की भूमिका का सबसे बड़ा उदाहरण था।*10 साल से अघोषित आपातकाल देश में लागू है मीडिया को सत्ता आसीन ने खरीद लिया विपक्ष को सीबीआई ईडी की कार्यवाही कर निष्क्रिय शांत बिठा रहे है सरकार ।3. जनता पार्टी का प्रयोग और उसका क्षय (1977–1980)जनता पार्टी ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर तो किया, लेकिन उसके अपने अंतर्विरोध ज्यादा लंबे समय तक साथ नहीं रह पाए।सत्ता में आकर जनता पार्टी ने आपातकाल को लोकतांत्रिक इतिहास का काला धब्बा करार दिया।विपक्ष अब पहली बार सत्ता की भाषा बोल रहा था, लेकिन आंतरिक संघर्षों ने इसे टिकने नहीं दिया।कांग्रेस की वापसी ने विपक्ष को फिर से पुनर्गठन के लिए मजबूर किया।*भाजपा देश की एक कमजोर पार्टी होने के बावजूद साजिश और कुचक्र नीति अपना कर विपक्ष को शांत कर अपनी मनमानी कर पूंजीपति को मजबूत कर अपना सुरक्षा कवच बना रही है ।4. बीजेपी का उदय: आंदोलन की राजनीति से राष्ट्रीय विकल्प (1980 के बाद)जनसंघ की वैचारिक विरासत और जनता पार्टी के टूटने के बाद 1980 में बनी भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस की नीतियों पर तीखा विरोध जारी रखा।बोफोर्स घोटाले ने कांग्रेस की विश्वसनीयता पर गहरा प्रहार किया और बीजेपी ने इसे भ्रष्टाचार विरोध के बड़े अभियान में बदला।राम जन्मभूमि आंदोलन ने बीजेपी को जन-आंदोलन की शक्ति दी और पूरे उत्तर भारत में कांग्रेस के पारंपरिक वोटबैंक को चुनौती दी।1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर विपक्ष ने सरकार के हर कदम पर सवाल उठाए।सड़क से संसद तक, बीजेपी कांग्रेस के लिए सबसे मजबूत चुनौती बनकर उभरी।* राम जी के नाम पर वोट तीन बार राम मंदिर पर इवेंट करवा कर आधार शिला ,शिलान्यास, ध्वज पताका फहरा कर दिखावटी धार्मिक राजनीति कर वोट बटोर रही ।5. विरोध की राजनीति का लोकतांत्रिक महत्वकांग्रेस के 60 साल के शासन में विपक्ष ने कई रूप बदले, विचार बदले, रणनीतियाँ बदलीं—लेकिन विरोध कभी नहीं रुका।कभी वैचारिक संघर्ष हुआ,कभी जन-आंदोलन,कभी भ्रष्टाचार विरोध,तो कभी धर्म-सांस्कृतिक मुद्दों पर ध्रुवीकरण।इन्हीं आंदोलनों ने भारत की लोकतांत्रिक परंपरा को मजबूत किया और सत्ता को जवाबदेह बनाए रखा।कांग्रेस के लम्बे शासनकाल में विपक्ष ने यह सिद्ध किया कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि निरंतर विरोध, सवाल और राजनीतिक संघर्ष से चलाया जाता है। जनसंघ से जनता पार्टी और फिर बीजेपी तक का सफर इसी विरोध-परंपरा की कहानी है—जहाँ सत्ता के एकछत्र राज को चुनौती देना भारतीय राजनीति की धड़कन बन गया।*विपक्ष नपुंसक भांति जनता को लूटते देख रही देश का खजाना खाली होता जा पूंजीपतियों तिजोरी भरती जा रही, विदेशी ताकतें भारत को बाजारू उपभोक्ता बना गुलाम बना रहे । रुपया 1₹ INR की कीमत 90$USD के बराबर
